भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ५५९ इसका एक ही उपाय है और वह तुम्हारे अधीन है। यह सुनकर बीरबर प्रसन्न होकर बोला—॥१३१ ॥ यदि ऐसा है तो उसे शीघ्र बताओ। जिससे मरे प्रभु का कल्याण हो। मेरे और मेरी स्त्री तथा पुत्र के प्राणों से भी यदि कोई उपाय हो तो मेरा जन्म सफल हो' ॥१३२॥ ऐसा कहते हुए बीरबर से पृथ्वी ने कहा—'राजभवन के पास जो चंडिका देवी का मन्दिर है वहाँ जाकर यदि तुम अपने पुत्र सत्ववर की भेंट (बलि) चढ़ा दो तो यह राजा जीवित रह सकता है और कोई दूसरा उपाय नहीं है॥१३३-१३४॥ पृथ्वी के वचन को सुनकर वीर बीरबर ने कहा—'देवि जाता हूँ और अभी इस उपाय को करता हूँ' ॥१३५॥ 'तुम्हारे सिवा स्वामी का हित और दूसरा कौन कर सकता है। अच्छा जाओ तुम्हारा कल्याण हो —ऐसा कहकर पृथ्वी अन्तर्हित हो गई और छिपकर पीछे-पीछे आए हुये राजा ने यह सब सुना ॥१३६॥ तदनन्तर, राजा विक्रमत्तुंग के छिप-छिप पीछा करते रहने पर वह बीरबर उसी रात्रि में अपने घर गया ॥१३६॥ तब स्त्री को जगाकर बीरबर न राजा के जीवन के लिए पुत्र के बलिदान तक का सारा वृत्तान्त जो पृथ्वी न कहा था स्त्री को सुनाया ॥१३७॥ यह सुनकर उसकी पत्नी बोली—'स्वामी का हित अवश्य करना चाहिए। इसलिए, पुत्र को जगाकर आप उससे कहिए' ॥१३८॥ तब बीरबर ने बालक को जगाकर उसे वह सब समाचार सुनाया जो राजा के लिए पृथ्वी ने कहा था ॥१३९॥ यह सुनकर वह यथाथर्नाम वाला बालक सत्ववर बोला—'पिता ! स्वामी के हित में प्राणों का उपयोग करनेवाला बड़ा मैं धन्य नहीं हूँ ? ॥१४० ॥ मैने जो उसका अन्न खाया है उसका प्रत्युपकार मुझे करना ही चाहिए। इसलिए, मुझे ले जाकर देवी को भेंट करो ॥१४१॥ ऐसा कहते हुए पुत्र से बीरबर ने धीरज के साथ कहा—'तू सचमुच मुझसे उत्पन्न हुआ मेरा पुत्र है' ॥१४२॥ बाहर खड़े हुए राजा विक्रमत्तुंग ने आश्चर्य के साथ सोचा कि ये सभी समान आत्मबल- वाले प्राणी हैं ॥१४३॥ तदनन्तर, बीरबर अपने पुत्र को कन्धे पर रखकर और उसकी पत्नी धर्मवती अपने पीछे कन्या बीरवती को लेकर उसी रात्रि में चंडिका के मंदिर में गये और छिपा हुआ राजा विक्रमत्तुंग भी उन लोगों के पीछे गया ॥१४४-१४५॥