भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ५६१ वहाँ जाकर कन्धे से उतारे हुए धैर्यराशि सत्त्ववर ने बालक होते हुए भी देवी को प्रणाम करके निवेदन किया- 'हे देवि ! मेरे सिर की बलि से हमारा स्वामी विक्रमतुङ्ग जीवित रहे और पृथ्वी का पालन करता रहे' ॥१४६-१४७॥ ऐसा कहते हुए सत्त्ववर को वीरवर ने 'वाह बेटा ठीक है' इस प्रकार कहा और म्यान से तलवार निकालकर उसका सिर काट दिया ॥१४८॥ और, 'राजा का कल्याण हो'- ऐसा कहते हुए वह सिर देवी को भेंट कर दिया। यह सत्य है कि सच्चे स्वामिभक्त सेवकों को पुत्र की या अपने प्राणों की चाह नहीं होती ॥१४९॥ इतने में ही उसने आकाशवाणी सुनी-'हे वीरवर बहुत अच्छा। तूने अपने पुत्र के प्राणों से भी स्वामी को जीवन प्रदान किया' ॥१५०॥ तब अत्यन्त चकित राजा के यह सब दृश्य देखते-सुनते सत्त्ववर की बहन वीरवर की कन्या वीरवती मृत भाई के समीप जाकर और उसके मस्तक को गोद में लेकर, चूमकर और 'हाय भाई'-इस प्रकार चिल्लाने लगी और हृदय फट जाने से मर गई ॥१५१-१५२॥ कन्या को भी मृत देखकर वीरवर की धर्मपत्नी धर्मवती पति को हाथ जोड़कर अत्यन्त दीनता के साथ बोली-॥१५३॥ 'राजा का कल्याण तो किया। अब मुझे भी आज्ञा दो। इन दोनों मृत बच्चों को लेकर मैं अग्नि में प्रवेश करूँ ॥१५४॥ जब कि यह अनजान बालिका भी भाई के शोक में मर गई, तब दोनों बच्चों के मरने पर मेरे जीवन की क्या शोभा है' ॥१५५॥ इस प्रकार, दृढ़तापूर्वक कहती हुई पत्नी से वीरवर ने कहा- 'हे सदाचारिणी ऐसा ही करो। मैं इस समय क्या कहूँ। पुत्रों के शोक से तुझे अब संसार में सुख नहीं है। प्रतीक्षा करो मैं तुम्हारे लिए चिता बनाता हूँ ॥१५६-१५७॥ ऐसा कहकर उसने वहाँ देवी के मन्दिर-निर्माण से बची हुई लकड़ी से चिता बनाई और दोनों बच्चों को उस पर रखकर आग लगा दी ॥१५८॥ तब वीरवर की भार्या पतिव्रता धर्मवती पति के चरणों में प्रणाम करके और हे आर्यपुत्र अगले जन्म में भी तुम्हीं मेरे पति होना ॥१५९॥ ७१

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