भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ५७५ नरवाहनदत्त का नारिकेल-द्वीप में जाना देवताओं से ईर्ष्या किया जाता हुआ नरवाहनदत्त उन देवपुत्रों से निमन्त्रित होकर उस रथ से नारिकेलद्वीप को गया ॥४९॥ नारिकेल-द्वीप में रूपसिद्धि आदि चारों देवपुत्रों से सत्कृत नरवाहनदत्त मैनाक ऋषभ आदि स्वर्ग से होड़ लेनेवाले उन चारों पर्वतों पर अप्सराओं के साथ रमण करने लगा ॥५०-५१॥ कौतुकी वह नरवाहनदत्त वसन्त के आगमन से विकसित नाना प्रकार के पुष्पों से शोभित वनों और वृक्षोंवाले उन पर्वतों की उद्यान भूमि में विहार करता था ॥५२॥ देखो ये वृक्षों की मंजरियाँ शून्य-रूपी बड़ी-बड़ी विकसित आँखों से आते हुए अपने कान्त वसन्त को देख रही हैं ॥५३॥ देखो हमारा जन्म-क्षेत्र इस सरोवर में सूर्य-किरणों का प्रचंड सन्ताप न पहुँच सके मानों इसीलिए कमलों ने खिलकर तालाब को ढक लिया है ॥५४॥ देखो खिले हुए कनिकार के गन्धहीन पुष्पों को भौंरे उसी प्रकार छोड़ रहे हैं जैसे श्रीमान् के नीच होने पर सज्जन उसे छोड़ देते हैं ॥५५॥ यहाँ देखो किन्नरियों के गान कोकिलों की कूक और भौंरों की गुनगुनाहट मानों ऋतुराज के आगमन के संगीत हैं । ॥५६॥ इस प्रकार, कहते हुए देवपुत्रों ने नरवाहनदत्त को अपने उद्यानों की पंक्तियाँ दिखाई ॥५७॥ नरवाहनदत्त वसन्तोत्सव का अभिनन्द-नृत्य करती हुई नागरिक स्त्रियों के गान का आनन्द लेता हुआ उस नगर में सानन्द क्रीड़ा करता रहा। वह यहाँ अप्सराओं के साथ देवताओं के योग्य आनन्द प्राप्त करता रहा। भाग्यवान् व्यक्ति जहाँ भी जाता है, भोग उसके पास पहले ही वहाँ उपस्थित हो जाते हैं ॥५८-५९॥ इस प्रकार वह तीन-चार दिनों तक वहाँ रहकर अपने उन मित्र देवपुत्रों से कहने लगा- 'पिताजी को देखने की उत्कंठा है। अतः अब मैं अपनी नगरी को जाता हूँ। देखिए, आपलोग मेरी नगरी में आकर मुझे कृतार्थ कीजिए' ॥६०-६१॥ यह सुनकर वे बोले-'उस नगरी के सारभूत आपको हमने देख लिया और क्या कहूँ ? जब आपकी सभी विद्याएँ प्राप्त हो जायें तब हम लोगों को आप स्मरण करें' ॥६२॥