भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ५८५ उस किनारे पहुँचकर और नाव से उतरकर वैश्य व्यापारियों के झुंड के साथ क्रमशः स्वदेश जाते हुए एक दिन सायंकाल के समय एक भीषण जंगल में जा पहुँचा ॥१२३॥ उस जंगल में झुंड के डेरा डालने पर और समुद्रशूर के जागते रहने पर वहाँ डाकुओं की बलवती सेना ने आक्रमण कर दिया॥१२४॥ उस सेना द्वारा व्यापारियों के मारे जाने पर, वह समुद्रशूर अपना सामान छोड़कर चुपचाप एक बड़े बरगद के वृक्ष पर चढ़कर छिप गया ॥१२५॥ समस्त व्यापारियों का माल लूटकर चले जाने के कारण भय से व्याकुल और दुःख से पीड़ित समुद्रशूर ने वह सारी रात उसी वृक्ष पर बिताई ॥१२६॥ प्रातःकाल वैश्रवण वृक्ष के ऊपरी भाग में दृष्टि डालते हुए समुद्रशूर ने पत्तों के झुरमुट में चमकती हुई दीपक की लौ-सी देखी ॥१२७॥ आश्चर्य चकित वैश्य उसे देखकर, जब ऊपर चढ़ा तब उसने वहाँ चील का घोंसला देखा जिसके भीतर से अमूल्य रत्नों का प्रकाश बाहर छिटक रहा था ॥१२८॥ उस वैश्य ने घोंसले में हाथ डालकर उसे उठा लिया और वही कंठहार उसे वहाँ दीख पड़ा जिसे उसने सुवर्ण-द्वीप में पाया था और जिसे राजसभा से चील झपट ले गया था ॥१२९॥ तब उस अनन्त धन को प्राप्त करके बनिया उस वटवृक्ष से नीचे उतरा और प्रसन्न होकर जाता हुआ क्रमशः अपने हर्षपुर नगर में पहुँच गया। वहाँ जाकर धन कमाने की चाह छोड़कर वैश्य समुद्रशूर, अपने परिवार के पास सानन्दपूर्वक रहने लगा। समुद्र में गिरना, धन का डूबकर नाश हो जाना, गले का हार पाना, मुर्दे पर बैठकर समुद्र पार करना, फिर उसका छिप जाना, निष्कारण मृत्युदंड मिलना, उसी क्षण प्रसन्न द्वीप के राजा से धन की प्राप्ति होना, मार्ग में फिर डाकुओं द्वारा उसका भी अपहरण हो जाना और अन्त में उस वृक्ष में फिर धन (हार) की प्राप्ति होना—आदि देखकर मानता रहता है महाराज कि दैव की गति विचित्र है। किन्तु पुण्यवान् व्यक्ति पहले दुःख का अनुभव करके अन्त में सुख पाता है ॥१३०—१३५॥ गोमुख से यह कथा सुनकर और उस पर विश्वास करके नरवाहनदत्त स्नान आदि नित्यकर्म के लिए सभा से उठ गया ॥१३६॥ ७४