भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ५८७ दूसरे दिन सभा में बैठे हुए उसके पास उसका बाल-मित्र और शूर राजपूत समरतुंग आकर बोला- महाराज मेरे कुटुम्बी दायाद संग्रामदर्प ने वीरजित आदि चार पुत्रों की सहायता से मेरे देश जीत लिये हैं ॥१३७-१३८॥ तो मैं जाकर उन पाँचों को बाँधकर लाता हूँ आपका यह विदित हो-ऐसा कहकर वह चला गया ॥१३९॥ नरवाहनदत्त ने समरतुंग की सेना को न्यून (कम) और संग्रामदर्प की सेना को अधिक जानकर समरतुंग की सहायता के लिए अपनी सेना भेज दी ॥१४० ॥ वह मानी समरतुंग उस सेना की सहायता लिये बिना ही वहाँ जाकर उन पाँचों शत्रुओं को अपने बाहुबल से जीतकर और एक साथ ही बाँधकर ले आया ॥१४१॥ इस प्रकार आये हुए उस विजयी वीर का सम्मान करके नरवाहनदत्त ने अपने उस सेवक की प्रशंसा की ॥१४२॥ आश्चर्य है कि विषय (देश) का आक्रमण किए हुए पाँच इन्द्रियों के समान इन पाँच शत्रुओं को जीतकर इसने पुरुषार्थ की साधना की है ॥१४३॥ यह सुनकर गोमुख ने कहा-'स्वामिन् यदि तुमने इसी प्रकार की राजा अमरदत्त की कथा न सुनी हो तो कहता हूँ सुनो - ॥१४४॥ राजा अमरदत्त की कथा हस्तिनापुर नाम का एक नगर है। वहाँ कोष (खजाना) दुर्ग (किला) और बल (सेना) से युक्त अमरदत्त नाम का राजा था। उसके साथ ही समरबल आदि उसके पास में उत्पन्न दायादों के राज्य थे। उन लोगों ने एकत्र होकर सोचा- ॥१४५-१४६॥ यह अमरदत्त हम लोगों में से एक-एक को सदा डराता रहता है अतः हम सब मिलकर इसका अपमान करें ॥१४७॥ ऐसी सहमति करके उस पर चढ़ाई करने के लिए उद्यत उन पाँचों राजाओं ने एकान्त में ज्योतिषी से चढ़ाई का मुहूर्त पूछा ॥१४८॥ वे लोग अगूढ़ संशय को दूर करके चढ़ाई करने के शुभ लग्न पूछना चाहते थे। तब ज्योतिषी ने कहा- इस वर्ष भर चढ़ाई का लग्न नहीं है ॥१४९ ॥ यदि किसी प्रकार तुमने चढ़ाई की भी तो उसमें तुम लोगों की विजय न होगी और उस अमरदत्त की मर्यादा न रखकर तुम लोगों का इससे अपहरण क्या है ? ॥१५० ॥