कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम लम्बक ६१ चित्रकार ने राजा के शरीर के अनुसार उसकी उठी हुई साफ बनाई लम्बी और साफ बाँहें ऊँचा और चौड़ा ललाट तथा घुँघराले कच बनाये। चौड़ी छाती बनाई जिसमें बाण आदि शस्त्रों के घाव स्पष्ट दीख रहे थे। दिग्गजों की सूँडों के समान उसने सुन्दर भुजाएँ बनाईं ॥४७-४८॥ कमर इस प्रकार पतली बनाई मानों सिंह-शावकों ने (राजा के पराक्रम से) पराजित होकर उपहार-स्वरूप भेंट कर दी हो। जवान हाथियों के बाँधने के निमित्त बने खम्भों की तरह पतली जांघें बनाई और अशोक के नये पत्तों के समान सुन्दर दोनों पैर बनाये ॥४९-५०॥ सामने ही राजा के सर्वथा अनुरूप चित्र को बने देखकर सभी लोग उस चित्रकार को धन्यवाद देने लगे ॥५१॥ और बोले—हम अकेले राजा का देखकर सन्तोष नहीं है। इसलिए दीवार में चित्रित इन रानियों में से किसी एक का चित्र राजा के साथ बनाओ। जिससे हमारी आँख को आनन्द मिले' ॥५२ ५३॥ यह सुनकर और दीवार पर चित्रित रानियों के चित्रों को देखकर चित्रकार ने कहा- इन रानियों में राजा के समान रूपवाली एक भी रानी नहीं है ॥५४॥ मैं समझता हूँ कि सारे भूमण्डल में राजा के समान रूपवाली सुन्दरी स्त्री है ही नहीं। हाँ एक राजकुमारी है सुनिए, मैं बताता हूँ —॥५५॥ विदर्भ देश में कुण्डिनपुर नाम का एक सम्पन्न नगर है वहाँ पर रुक्मरुचि नाम से प्रसिद्ध एक राजा है ॥५६॥ उसकी प्राणों से भी प्यारी अनंगमंजरी नाम की रानी है। उस रानी से राजा से उत्पन्न मदनसुन्दरी नाम की कन्या है। एक ही जिह्वा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करने के लिए मेरे जैसा व्यक्ति समर्थ नहीं है। फिर भी मैं इतना ही कहता हूँ कि ब्रह्मा उसे बनाकर अब पुनः इच्छा होने पर भी यथा शक ऐसी सुन्दरी को नहीं बना सकता ॥५७—५८॥ सारी पृथ्वी में वही एक इस राजा के सदृश सुन्दरी कन्या है। रूप लावण्य अवस्था कुल आदि सभी में वह इस राजा के उपयुक्त है ॥५९॥ एक बार वहाँ रहते हुए मैं दाइयों द्वारा बुलाये जाने पर उनके रनिवास में गया था ॥६१॥ ७३