कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादश लम्बक ४५५ और, उसका नाम रश्मिमान्¹ रखकर, उसका पालन-पोषण करके स्नेहपूर्वक उसे सभी विद्याएँ सिखाईं ॥९८॥ इसलिए, यह वही मुनिकुमार रश्मिमान् है, जो लक्ष्मी का पुत्र है और मेरे साथ भ्रमण करते हुए यहाँ आ गया है ॥९९॥ ऐसा कहकर उसके साथी ने मेरी सखी से मेरा परिचय पूछा। उसने मेरा नाम और कुल का परिचय देकर मुझसे कही गई सभी बातें उससे कह दीं ॥१००॥ इस प्रकार परस्पर नाम कुल आदि जानने के पश्चात्, अधिक बढ़े हुए मुनिकुमार और मैं दोनों परस्पर एक-दूसरे को देखते हुए बैठे रहे ॥१०१॥ इतने में ही दूसरी सहेली मेरे घर से आकर बोली-‘चलो उठो भोजनालय में तुम्हारे पिता तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं' ॥१०२॥ यह सुनकर तुरन्त जाऊँगी' ऐसा कहकर और मुनिपुत्र को वहीं बैठाकर मैं डरती हुई पिता के पास गई ॥१०३॥ वहाँ भोजन करके मैं जैसे ही जाने को तैयार हुई, वैसे ही मेरी पहली सखी ने आकर एकान्त में मुझसे कहा—॥१०४॥ ‘सखि इस मुनिपुत्र का मित्र यहाँ आया है और आँगन के द्वार पर खड़ा है। वह शीघ्रता- पूर्वक मुझसे बोला—॥१०५॥ ‘मुझे रश्मिमान् ने अभी ही मनोरथप्रभा के पास पिता से प्राप्त आकाशगामिनी विद्या देकर भेजा है और कहा है कि मैं उस प्राणेश्वरी के बिना कामदेव के द्वारा भीषण स्थिति में पहुँचा दिया गया हूँ। अब क्षण-भर भी मैं अपने प्राणों का धारण नहीं कर सकता' ॥१०६-१०७॥ ऐसा सुनकर मैं तुरन्त आये हुए उस मुनिपुत्र और सखी के साथ मैं यहाँ आई ॥१०८॥ आने पर मैंने देखा कि वह मुनिपुत्र रश्मिमान् चन्द्रमा के उदय के साथ ही मेरे बिना प्राणों के निकल जाने से मर चुका है ॥१०९॥ तब मैं उसके वियोग से पीड़ित होकर अपने शरीर की निन्दा करती हुई, उसके शरीर को लेकर चिता में जलने (सती होने) की इच्छा करने लगी ॥११०॥ इतने में तेज के पुंज के समान देदीप्यमान कोई पुरुष आकाश से उतरकर और उसके शरीर को उठाकर आकाश में उड़ गया ॥१११॥ फिर भी जब मैं अकेली ही आग में जलने के लिए उद्यत हुई तब मुझे आकाशवाणी सुन पड़ी—॥११२॥ १ कादम्बरी का पुण्डरीक।