कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
पृष्ठ 804, कुल 1079 में से
संदर्भ में पढ़ें'हे मनोरथप्रभे ऐसा न करो। इस मुनिकुमार के साथ तेरा यथासमय पुनः संगम होगा' ॥११३॥ यह सुनकर, मरने से लौटकर और उसकी प्रतीक्षा में आशा बाँधकर शिवजी की आराधना करती हुई बैठी हूँ ॥११४॥ मुनिकुमार का वह मित्र भी न जाने कहाँ अदृश्य हो गया। इस प्रकार कहती हुई विद्याधरी से सोमप्रभ ने कहा— 'तो तू अकेली क्यों है? तेरी वह सखी कहाँ है? इस प्रकार कहते हुए सोमप्रभ से वह विद्याधरी मनोरथप्रभा बोली—॥११५-११६॥ सिंहविक्रम नाम का विद्याधरों का राजा है। उसकी असाधारण सुन्दरी मकरन्दिका नाम की कन्या है ॥११७॥ वह मेरी प्राणों के समान प्यारी और मेरे दुःख से दुःखिता उस कुमारी मकरन्दिका ने मेरा समाचार जानने के लिए आज एक सहेली को भेजा था। मैंने उसकी सखी के साथ अपनी सखी को भी भेज दिया है। इसलिए, इसी समय मैं यहाँ अकेली हूँ ॥११८-११९॥ इस प्रकार कहती हुई मनोरथप्रभा ने उसी समय आकाश से उतरी हुई अपनी सहेली को सोमप्रभा के लिए दिखाकर उसका परिचय कराया ॥१२०॥ और, मकरन्दिका का वृत्तान्त सुनानेवाली उस सखी द्वारा सोमप्रभ के लिए पत्तों का बिछावन बनवाया और उसके घोड़े को घास खिलवाई ॥१२१॥ तब वही सरोवर के तट पर रात्रि व्यतीत कर, प्रातःकाल वे सब उठे और उन लोगों ने आकाश से उतरे हुए एक विद्याधर को देखा ॥१२२॥ वह देवजय नाम का विद्याधर, प्रणाम करके और पास में बैठकर मनोरथप्रभा से इस प्रकार बोला—॥१२३॥ 'हे मनोरथप्रभे तुमसे राजा सिंहविक्रम यह कहता है कि जबतक तुम्हारे पति का निश्चय नहीं होता तबतक मेरी कन्या मकरन्दिका भी विवाह नहीं करना चाहती। इसलिए, जाकर इसे समझ ओ कि यह विवाह के लिए तैयार हो ॥१२४ १२५॥ यह सुनकर मनोरथप्रभा सखी के स्नेह के कारण जब उसके पास जाने को उद्यत हुई, तब सोमप्रभ ने उससे कहा—॥१२६॥ 'हे पवित्र चरित्रवाली मुझे भी विद्याधरों का लोक देखने का कुतूहल है। इसलिए, मुझे भी ले चलो। घास दिया हुआ घोड़ा यहीं रहे ॥१२७॥
१ यही बाणभट्ट की कादम्बरी है।-अनु