कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वयष्टम लम्बक ७५९ यह सुनकर और 'ऐसा ही होगा' इस प्रकार कहकर देवजय की गोद में बैठे हुए सोमप्रभ और सखी के साथ मनोरथप्रभा मकरन्दिका के घर गई ॥१२८॥ और, मकरन्दिका द्वारा आतिथ्य-सत्कार किये जाने पर एकान्त में सोमप्रभ के सम्बन्ध में 'यह कौन हैं' इस प्रकार पूछी गई मनोरथप्रभा ने जब मकरन्दिका से सोमप्रभ का समाचार कहा तब मकरन्दिका सोमप्रभ पर हृदय से आसक्त हो गई ॥१२९ १३०॥ सोमप्रभ भी मूर्तिमती लक्ष्मी के समान उस मकरन्दिका पर मन से आसक्त होकर सोचने लगा कि 'वह कौन पुण्यात्मा (धन्य) होगा जो इसका पति होगा ॥१३१॥ तदनन्तर, हास्यहास्य वार्ता के प्रसंग में मनोरथप्रभा ने मकरन्दिका से पूछा- 'हे चंडि तू विवाह करना क्यों नहीं चाहती ? ॥१३२॥ यह सुनकर मकरन्दिका मनोरथप्रभा से बोली—'मैं कैसे विवाह करूँ क्योंकि तू मुझे अपने शरीर से भी अधिक प्यारी है। जबतक तू वर को स्वीकार नहीं करती तबतक मैं कैसे विवाह कर लूँ ? ॥१३३॥ मकरन्दिका के प्रेम के साथ ऐसा कहने पर, मनोरथप्रभा उससे बोली-'अरी पगली मैंने तो वर का वरण कर लिया है ॥१३४॥ अब केवल उसके समागम की प्रतीक्षा कर रही हूँ। मनोरथप्रभा के इस प्रकार कहने पर मकरन्दिका ने कहा-'तब ठीक है मैं तेरी बात मानूँगी' ॥१३५॥ तब मनोरथप्रभा मकरन्दिका के मनोभाव को जानकर बोली- 'सखि देखो यह सोम प्रभ सारी पृथ्वी का भ्रमण (विजय) करके तुम्हारे अतिथि के रूप में यहाँ आया है ॥१३६॥ सो हे सुन्दरि, तुझे इसका आतिथ्य-सत्कार करना चाहिए। ऐसा सुनते ही मकरन्दिका ने मनोरथप्रभा से कहा- शरीर से लेकर मेरा सब कुछ इसी का है। मैंने सब कुछ देने के लिए इस अर्थ का पात्र बना दिया है। यदि यह चाहे तो स्वीकार करें ॥१३७-१३८॥ इस प्रकार मकरन्दिका के कहने पर, मनोरथप्रभा ने क्रमशः उसके पिता सिंहविक्रम से सब कहकर उन दोनों के विवाह की बात पक्की कर दी ॥१३९ ॥ तब सोमप्रभ भी धैर्य धारण करके मनोरथप्रभा से प्रसन्नतापूर्वक बोला- मैं अब तुम्हारे आश्रम को जाता हूँ जहाँ पर कदाचित् मुझे ढूँढ़ती हुई मेरी सेना और मन्त्री आ गये होंग वे मुझे वहाँ न पाकर अहित की आशंका से उलटे लौट जावेंगे ॥१४०-१४१॥ इसलिए वहाँ जाकर और सेना का समाचार जानकर तथा उधर से निश्चिन्त होकर मकरन्दिका से विवाह करूँगा' ॥१४२॥