कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ७८७ पहले के विश्वास के कारण सरल और उदासीन संजीवक बैल दमनक की बात सुनकर और उसे सत्य मानकर बोला—॥१४३॥ 'खेद है कि नीच परिजनों से घिरा हुआ नीच स्वामी सदा शत्रु ही बनता है। इस सम्बन्ध में यह कथा सुनो' ॥१४४॥ मदोत्कट सिंह की कथा किसी वन में मदोत्कट नाम का सिंह था और उसके तीन अनुचर थे—बाघ, कौआ और सियार ॥१४५॥ उस सिंह ने एक बार वन में पहले कभी न देखे हुए, अपने झुंड से अलग हुए और हँसने योग्य स्वरूपवाले ऊबड़-खाबड़ ऊँट के एक बच्चे को देखा ॥१४६॥ 'यह कौन जीव है! मृगराज के आश्चर्य के साथ ऐसा पूछने पर, अनेक देशों में भ्रमण किया हुआ कौआ बोला 'यह ऊँट है' ॥ १४७॥ तब सिंह ने उस विचित्र प्राणी को अभयदान देकर अपने पास रख लिया ॥१४८॥ एक बार हाथी के साथ युद्ध करने में सिंह आहत होकर अस्वस्थ हो गया और उसने उन स्वस्थ अनुचरों के साथ अनेक उपवास किये ॥१४९॥ तब भूख से व्याकुल सिंह ने घूमते हुए, कुछ न पाया तब ऊँट को छोड़कर अन्य तीन अनुचरों से एकान्त में उसने पूछा कि अब क्या करना चाहिए ? ॥१५० ॥ वे सब बोले-'स्वामिन् ! हमलोगों को आपत्ति के समय उचित ही कहना चाहिए। ऊँट के साथ हमलोगों की क्या मित्रता ? तो क्या न उसे ही खाया जाय ॥१५१॥ यह घास खानेवाला हम मांस खानेवालों का भक्ष्य तो है ही। बहुतों को मास खाने के लिए एक का ही बलिदान क्या न किया जाय ॥१५२॥ यदि स्वामी यह कहें कि अभय दिये गये प्राणी को कैसे मारा जाय तो हम लोग उपाय करके उसकी ही वाणी द्वारा उसका शरीर आपको अर्पण करा दें। इस प्रकार कहने पर सिंह द्वारा स्वीकृति पाकर कौआ अपने साथियों से ऊँट के वध का विचार करके उस ऊँट के बच्चे से बोला—॥१५३ १५४॥ कि हमारा यह स्वामी भूख से व्याकुल होने पर भी हम लोगों से कुछ नहीं कह रहा है। अतः अपने को प्रदान करने की बात कहकर हमलोगों को उसका प्रिय करना चाहिए ॥१५५॥ हमलोग तो ऐसा करेंगे ही पर तुम्हें भी ऐसा ही करना चाहिए, जिससे स्वामी हम पर प्रसन्न हों। कौए के इस प्रकार कहने पर ऊँट के उस सरल बच्चे ने उसकी इस बात को स्वीकार कर लिया ॥१५६॥