कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ७१५ जबी वह पूंछ को ऊपर करके चारों पैरों को एक साथ ही उठायेगा तब तुम उसे अपने ऊपर प्रहार करनेवाला समझना ॥१९६॥ तुम भी तैयार रहकर नीचे सिर करके अपने दोनों सींगों से उसके पेट में आघात करके गिराये हुये शत्रु की अंतड़िया को निकाल लेना' ॥१९७॥ दमनक इस प्रकार संजीवक बैल से कहकर करटक के पास गया और दोनों का विरोध उसे सुनाया ॥१९८॥ तब संजीवक धीरे से पिंगलक की भाव-भंगियों से उसके चित्त को समझने के लिए उसके पास गया और उसे पूंछ उठाकर चारों पैरों को एक साथ उठाये हुए देखा। सिंह ने भी शंका से अपने सिर को हिलाते हुए उसे देखा ॥१९९-२००॥ तब सिंह ने उठकर बैल को नखों से मारा और बैल ने सींगों से उस पर प्रहार किया। इस प्रकार दोनों का युद्ध आरम्भ हुआ ॥२०१॥ यह देखकर साधु करटक दमनक से बोला-तूने अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए स्वामी पर नई विपत्ति खड़ी कर दी' ॥२०२॥ प्रजा को सताकर प्राप्त की गई सम्पत्ति धूर्तता से की गई मित्रता और कठोरता से हरण की गई कामिनी चिरकाल तक नहीं रहती ॥२०३॥ हितकारी बातों का अपमान करनेवाले से जो बहुत कहता है वह उससे बुराई ही पाता है। जैसे सूचीमुख ने बन्दर से बुराई प्राप्त की ॥२०४॥ सूचीमुख पक्षी और बन्दर की कथा पहले समय किसी वन में झुंड के साथ विचरनेवाले बन्दर रहते थे। उन्होंने कभी शीतकाल में चमकते हुए जुगनू को देखकर उसे आग की चिंगारी समझा और उस पर घास और सूखे पत्ते डालकर शरीर को सेकने लगे ॥२०५-६॥ उनमें से एक बन्दर ने मुख से फूंक लगाकर उस जुगनू को जलाने की चेष्टा की ॥२०७॥ यह देखकर सूचीमुख नाम का पक्षी उस बन्दर से बोला- यह आग नहीं, जुगनू है। इस फूंकने का व्यर्थ प्रयत्न न करो। यह सुनकर भी न माननेवाले और बार-बार फूँकते हुए बन्दर के पास पेड़ से नीचे आकर उस पक्षी ने आग्रहपूर्वक उसे रोका किन्तु उससे रुष्ट होकर उस ही गया ॥२०८-२०९॥