भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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पृष्ठ 858

पञ्चम सम्वाद ८०९ राजा के आज्ञानुसार उसके कुछ अधिकारियों ने कुछ गँवारों को बुलाकर खजूर तोड़ लाने के लिए नियुक्त किया ॥१२॥ उन लोगों ने खजूर के एक पेड़ को गिरा देखकर और उससे खजूरों को बिना कष्ट के पाने के योग्य समझकर, अपने गाँव के सभी खजूर के पेड़ काटकर गिरा दिये ॥१३॥ उन गिरे हुए वृक्षों के सारे खजूर एकत्र कर लेने पर वे उन वृक्षों को उठाकर फिर से रोपने लगे किन्तु ऐसा न कर सके । तब राजा के पास खजूर लाने पर उनकी मूर्खता को सुनकर राजा ने सभी को दंड दिया ॥१४-१५॥ मूर्ख मन्त्री की कथा खजूर खानेवालों का हास्य सुना । अब भूमि में गड़े धन को देखनेवाले की कथा सुनो। किसी राजा ने गड़ा हुआ धन बताने के लिए किसी ज्ञानी को कहीं से बुलवाया। किन्तु, राजा के मूर्ख मन्त्री ने सोचा कि यह कहीं भाग न जाय इसलिए उसकी दोनों आँखें निकलवा लीं ॥१६-१७॥ तब वह ज्ञानी भूमि के लक्षण देखने और चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गया। उसे अन्धा देखकर सभी लोग हँसी करने लगे ॥१८॥ नमक खानेवाले की कथा अब एक नमक खानेवाले की कथा सुनो। किसी गाँव का रहनेवाला मङ्गर नाम का एक वज्रमूर्ख पुरुष था। उसको किसी नागरिक मित्र ने अपने घर लेजाकर खूब स्वादिष्ट भोजन कराया ॥३९-४०॥ उस मङ्गर ने अपने मित्र से पूछा कि 'भोजन में इतना स्वाद किस कारण हुआ ? तब उसने कहा—'इसमें प्रधानता नमक की है' ॥४१॥ तब उस गँवार ने सोचा कि जब अल्प से ही इतना स्वाद है, तो क्यों न केवल नमक ही खाया जाय। ऐसा सोचकर उसने मुट्ठी-भर नमक का चूर्ण मुँह में डाक लिया और खाने लगा ॥४२॥ उस नमक के चूर्ण से उस मूर्ख के ओठ दाढ़ी और मूंछ सब मर गये और उसका श्वेत मुँह का देखकर लोगों के मुँह भी हँसी से श्वेत हो गये ॥४३॥ गाय दुहनेवाले की कथा हे प्रभो सस्याघाती की कथा तुमने सुनी। अब गौ दुहनेवाले की कथा सुनो। एक गँवार ग्वाला था। उसके पास एक गाय थी ॥४४॥ १ २