भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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षष्ठम लम्बक ४२३ तब हिरण्यक ने जाल को दाँतों से काटकर क्षण-भर में जाल से बँधे हुए चित्रांगद को मुक्त कर दिया ॥१२८॥ तबतक नदी के मध्य से आकर मन्थरक कछुआ भी उनके पास किनारे पर आकर मिल गया ॥१२९॥ उसी समय जाल बाँधनेवाले बहलिये ने आकर मृग चूहे और कौए के भाग जाने पर उस कछुए को ही पकड़ लिया ॥१३०॥ हिरन के भागने से व्याकुल बहलिये ने कछुए को घास में रखकर, उसी से सन्तोष किया और घर की ओर चल पड़ा। उसके चलने पर दूरदर्शी हिरण्यक के परामर्शानुसार वह मृग कुछ दूर जाकर और गिरकर मुर्दे के समान पड़ गया और कौआ उसके सिर पर बैठकर मानों उसकी आँखें निकालने लगा ॥१३१ १३२॥ बहलिये ने दूर से हिरन को मरा समझकर और कछुए को घास-सहित नदी के किनारे रखकर मृग को लेने का प्रयत्न किया ॥१३३॥ उसे दूसरी ओर जाते हुए देखकर चूहे ने जाल काटकर कछुए को मुक्त कर दिया और वह नदी में कूद पड़ा ॥१३४॥ हिरन भी कछुए को रखकर आते हुए बहेलिये को देखकर छलांग मारकर भागा और कौआ उड़कर वृक्ष पर बैठ गया ॥१३५॥ उधर से निराश लौटकर आए हुए बहेलिये ने जाल काटकर भाग हुए कछुए को भी न पाकर, दोनों ओर से हताश होकर अपने भाग्य को कोसा और अन्त में वह अपने घर चला गया ॥१३६॥ तब वे चारों मित्र फिर आपस में मिले और प्रेमी मृग उनसे बोला- ॥१३७॥ मैं भाग्यवान् हूँ कि आपलोग जैसे सच्चे और सहृदय मित्र मुझे मिले जिन्होंने अपने प्राणों की भी परवाह न करके मुझे मौत के पंजे से उबार लिया ॥१३८॥ इस प्रकार उस हिरण से प्रशंसित वे चारों मित्र कौआ कछुआ चूहा और हिरण उस वन में परस्पर प्रेम के साथ सुखी होकर रहने लगे ॥१३९॥ इस प्रकार पशु भी बुद्धि से अपना कार्य सिद्ध कर लेते हैं। वे भी अपने प्राणों की चिन्ता न करके आपत्तिके समय मित्र को नहीं छोड़ते ॥१४०॥ मित्रों में परस्पर ऐसी आसक्ति कल्याणकारी होती है, किन्तु यह ईर्ष्या के कारण स्त्रियों में प्रशंसनीय नहीं होती। इस सम्बन्ध में कथा सुनो ॥१४१॥ ईर्ष्यालु पुरुष और उसकी दुष्ट स्त्री की कथा किसी नगर में कोई ईर्ष्यालु पुरुष था। उसकी स्त्री बहुत रूपवती थी और उसे बहुत प्यारी थी ॥१४२॥