भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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षष्ठम लम्बक ८१५ तब यह सुनकर मन ही मन हँसते हुए मन्त्री लोग चुप बैठ गए। इस प्रकार, मूर्ख तबतक धन को नहीं छोड़ता जबतक धन उसे नहीं छोड़ता ॥२१८॥ दो मित्रों की कथा ‘महाराज मूर्ख राजा की कथा सुनी। अब बीच में दो मूर्ख मित्रों की कथा सुनिए। कान्यकुब्ज देश में चन्द्रापीड नाम का एक राजा था ॥२१९॥ उसका धवलमुख नाम का एक सेवक था। वह सदा बाहर से ही खा-पीकर घर में जाता था। एक दिन उसकी स्त्री ने उससे पूछा कि तुम प्रतिदिन बाहर कहाँ से खा-पीकर आते हो? तब धवलमुख ने कहा—हे सुन्दरी मैं सदा अपने मित्र के यहाँ से खा-पीकर आता हूँ। मेरे दो मित्र हैं ॥२२०—२२२॥ उनमें एक कल्याणवर्मा नाम का मित्र सदा ही भोजन आदि से मेरा उपकार करता है। दूसरा वीरबाहु नाम का मित्र है, जो अपने प्राणों से भी मेरा उपकार करता है ॥२२३॥ उसके इस प्रकार कहने पर उसकी स्त्री ने उससे कहा—‘तुम उन दोनों मित्रों को मुझे दिखाओ’ ॥२२४॥ तदनन्तर, वह धवलमुख स्त्री के साथ कल्याणवर्मा के घर गया और उसने बहुमूल्य सामान से उनका स्वागत-सत्कार किया ॥२२५॥ तब दूसरे दिन धवलमुख अपनी पत्नी के साथ वीरबाहु के पास गया। जुआ खेलते हुए उसने धवलमुख और उसकी स्त्री का साधारण स्वागत करके उसे विदा कर दिया ॥२२६॥ तब धवलमुख की स्त्री ने उससे आश्चर्य के साथ कहा— ‘कल्याणवर्मा ने तो तुम्हारा बहुत आतिथ्य-सत्कार किया ॥२२७॥ किन्तु, वीरबाहु ने बहुत साधारण स्वागत किया। इसलिए, तुम वीरबाहु को कल्याणवर्मा से अधिक स्वागत-सत्कार करनेवाला (प्राण देनेवाला) क्यों मानते हो ? ॥२२८॥ यह सुनकर, धवलमुख अपनी पत्नी से बोला कि तू जाकर, यों ही उनकी परीक्षा लेने की दृष्टि से उन दोनों से कह दे कि ‘राजा अकस्मात् ही हमारे लिए क्रुद्ध हो गया है। उसके बाद स्वयं ही तुझे सब मालूम हो जायगा ॥२२९॥ धवलमुख से इस प्रकार कही गई उसकी स्त्री ने वैसे ही जाकर उसके दोनों मित्रों से कह दिया ॥२३०॥ उसने पहले कल्याणवर्मा से कहा तो वह सुनते ही कहने लगा— मैं बनिया का पुत्र हूँ। तुम्हीं बताओ मैं राजा का क्या करूँ?’ उससे इस प्रकार कही गई वह स्त्री उसके बाद वीरबाहु के पास गई ॥२३१॥ उससे भी उसने उसी प्रकार पति से राजा के अप्रसन्न होने की बात कही। यह सुनते ही वीरबाहु ढाल-तलवार लेकर दौड़ता हुआ धवलमुख के पास आया ॥२३२॥