कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ८६५ 'आपकी शरण म आया हुआ आपत्तिग्रस्त यह चिरंजीवी दया करने के योग्य है। राजा शिबि ने शरणागत की रक्षा के लिए अपना मांस भी दे दिया था ॥१०॥ प्राकारकर्ण से यह सुनकर उलूकराज ने अपने क्रूरलोचन नाम के मंत्री से चिरंजीवी के सम्बन्ध में पूछा कि इसका क्या करना चाहिए ? क्रूरलोचन ने भी प्राकारकर्ण की ही बात दुहराई। तब उलूकराज ने रक्ताक्ष नाम के अपने मन्त्री से उसी प्रकार पूछा। वह बुद्धिमान् मन्त्री इस प्रकार बोला-॥१११२॥ 'राजन् इन मन्त्रियों ने उल्टी नीति से तुझे नष्ट कर दिया। ये नीतिज्ञ नही प्रतीत होते ॥१ ३ रथकार और उसकी पत्नी की कथा मूर्ख व्यक्ति अपराध को देखकर भी झूठी सान्त्वना देने पर प्रसन्न हो जाता है। (इस विषय मे एक कथा सुनो) कहीं एक बढ़ई रहता था उसकी पत्नी उसे बहुत प्रिय थी ॥१४॥ उसकी स्त्री पर-पुरुष का संग करती है दूसरे लोगो से यह जानकर वह उसका भेद लेने के लिए एक बार अपनी पत्नी से बोला- ॥१५॥ 'प्रिय मैं राजा की आज्ञा से व्यापार के लिए कहीं दूर देश को जाता हूँ। इसलिए, तू पाथेय (मार्ग का भोजन) के लिए मुझे सत्तू आदि दे दे' ॥१६॥ अच्छा ठीक है—कहकर दिये हुए उसके पाथेय को लेकर और अपने एक शिष्य के साथ घर से बाहर निकलकर वह चुपके-से फिर घर म ही आ घुसा ॥१७॥ घर में अपनी पत्नी के परोक्ष मे वह शिष्य के साथ चारपाई के नीचे जा छिपा। पति चला गया यह जानकर उसकी स्त्री ने भी अपने जार को बुलाया और उस जार के साथ उसी चारपाई पर रमण करती हुई उसकी स्त्री ने अपने पति के अंग का स्पर्श करके यह जान लिया कि पति यहीं है। कुछ समय बाद उसके जार ने व्याकुलता के साथ उससे पूछा—'प्रिय यह बताओ कि मैं तुम्हें अधिक प्यारा हूँ या तुम्हारा पति ? ॥१८॥११॥ यह सुनकर अत्यन्त चतुर उस स्त्री ने अपने यार से कहा—'मुझे अपना पति इतना प्यारा है कि मैं उसके लिए अपने प्राणों को भी छोड़ दूँ' ॥१११॥ पर पुरुष का संग कर लेना तो स्त्रियों का स्वाभाविक धर्म है। इसमें क्या किया जा सकता है। यदि स्त्रियों को नाफ़ न हो तो उनके लिए विष्ठा खा ना भी असम्भव नही ॥११२॥ ११