कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
पृष्ठ 920, कुल 1079 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ८७१ आप सब लोग दिन में उसके आक्रमण के भय से बचने के लिए अपने घोंसलों को घास फूस आदि से ढककर उसके अन्दर सुरक्षित रहें ॥१४३॥ ऐसा कहकर, उल्लुओं को घास तथा सूखे पत्तों से ढके हुए द्वारवाली गुफा के भीतर करके चिरजीवी अपने स्वामी काकराज मेघवर्ण के पास गया ॥१४४॥ और जलती हुई चिता से एक-एक जलती हुई लकड़ी चोंच में लटकाए हुए कौओं को साथ लेकर वह वहाँ आया ॥१४५॥ और आकर दिन में अन्धे उन उल्लुओं के घास-फूस से ढके हुए गुफा के द्वार पर आग लगा दी ॥१४६॥ वह आग लगाकर, एक-एक लकड़ी चोंच से उठाकर आग में छोड़ता जाता था। इस प्रकार उसने राजा के सहित सभी उल्लुओं को जलाकर भस्म कर डाला ॥१४७॥ तदनन्तर, कौओं का राजा शत्रुओं का नाश करके अपने काक-परिवार के साथ पुनः उसी वटवृक्ष पर सुखपूर्वक निवास करने लगा ॥१४८॥ इसके बाद चिरजीवी ने काकराज मेघवर्ण को शत्रुओं के बीच रहने का अपना सारा समाचार सुनाकर यह कहा-॥१४९॥ 'स्वामिन् वहाँ तुम्हारे छत्र का एक ही मन्त्री था उसी की बात न मानकर उस मदान्ध उलूकराज ने मेरी उपेक्षा की। उस मूर्ख ने रक्ताक्ष मन्त्री की बात नहीं मानी इसीलिए नीतिहीन उस मूर्ख को मैंने विश्वास दिलाकर ठग लिया ॥१५०-१५१॥ मेंढकों के वाहन सर्प की कथा जैसे कपट-वृत्ति से विश्वास दिलाकर साँप ने मेढक को ठग लिया था'। एक वृद्ध साँप अपना चारा प्राप्त करने में असमर्थ होकर एक तालाब के किनारे निश्चल होकर पड़ा था। इस प्रकार, दीन साँप को देखकर दूर खड़े हुए मेढकों ने पूछा- अब तुम पहले के समान हम लोगों को क्या नहीं खाते हो। मेढक के इस प्रकार पूछने पर साँप ने उनसे कहा- 'एक बार एक मेढक की ओर दौड़ते हुए मैंने भ्रम से एक ब्राह्मण के बालक को काट लिया और वह मर गया। तब उसके पिता ने शाप से मुझे मेढक का वाहन बना दिया। तब मैं तुम लोगों को कैसे खाऊँ ? बल्कि आओ तुम लोगों को ढोने का काम करूँ ॥१५२-१५६॥ यह सुनकर उस पर सवारी करने के लिए उत्सुक मेढकों का राजा पानी से निकलकर उसकी पीठ पर निर्भय होकर चढ़ बैठा ॥१५७॥