भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

पृष्ठ 927, कुल 1079 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 927

दशम लम्बक ८७९ 'चमड़े के भीगा होने से उसके भीतर रखे वस्त्र नष्ट हो जायेंगे-यह मैंने कपड़ों की रक्षा के लिए ही तो कहा था। चमड़े की रक्षा के लिए नहीं'—ऐसा कहकर उस बनिये ने ऊँट के दूसरे बच्चे पर भार लादा और वहाँ से घर गया। घर जाकर उसने सेवकों का सर्वस्व हरण करके उन्हें दंड दिया॥२ १२ २॥ इस प्रकार मूर्ख व्यक्ति हृदय की सच्ची भावना न समझकर सीधी बात को भी उल्टी समझते हैं और अपनी तथा दूसरों की हानि कर डालते हैं और वैसा ही उत्तर भी देते हैं॥२ १॥ अपूपमूर्ख की कथा इसी प्रकार मालपुए के मूर्ख की कथा संक्षेप में सुनो। किसी बटोही ने एक पैसे के आठ पूए खरीदे। उनमें से छह पूए खा लेने तक उसका पेट न भरा किन्तु सातवाँ पूवा खाते ही उसका पेट भर गया। यह देखकर वह खिसियाने लगा कि 'हाय मैं लुट गया। यदि मैं इस सातवें पूए को पहले खा जाता तो बाकी पूए नष्ट न होते। इसी एक से ही पेट भर जाता ? उसकी यह बात सुनकर वहाँ बैठ सभी व्यक्ति पेट पकड़-पकड़कर हँसने लगे ॥२ ४ २ ८॥ एक मूर्ख नौकर की कथा अब एक और महामूर्ख की कथा सुनो। किसी बनिये का मूर्ख सेवक था। बनिये ने उससे कहा-'दुकान के दरवाजे की रक्षा करना मैं थोड़ी देर के लिए घर जाता हूँ। बनिये के इस प्रकार कहकर चले जाने पर वह दुकान के दरवाजे को अपने कन्धे पर रखकर कहीं नट का खेल देखने चला गया। बनिये ने आकर जब यह देखा तब उसे खूब डाँटा। तब सेवक ने उत्तर दिया कि तुमने द्वार की रखवाली के लिए कहा था तब मैंने उसकी रक्षा कन्धे पर रखकर की ॥२ १-२११॥ इस प्रकार, किसी बात के भीतरी अर्थ को न समझकर मूर्ख केवल शब्द को ही पकड़ते हैं। इसी प्रकार एक महिष मूर्ख की कथा सुनो॥२१२॥