भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक १६७ तब कन्द और फल आदि का आहार करते हुए उस वैश्यपुत्र ने पत्नी के साथ तपस्या करते हुए उसी वन में निवास किया ॥१४॥ एक बार उस वाणिग्दत्त के अंध वैश्यपुत्र के कन्द फल आदि लेने के लिए दूर निकल जाने पर, काम-वासना से पीड़ित उसकी स्त्री उस रंड पर आसक्त हो गई और उसके साथ रमण करने लगी ॥१५॥ उसके सम्पर्क में आकर और उससे सम्मति करके अपने पति का वध करने की इच्छा से वह पापिन दुराचारिणी बीमारी का बहाना बनाकर पड़ गई ॥१६॥ दुस्तर नदी के करारे में नीचे की ओर उगी हुई किसी ओषधि को दिखाकर, वह, अपने पति से बोली कि यदि तुम उस ओषधि को ला दो तो मैं जी सकती हूँ, ऐसा मुझे स्वप्न में देवता ने कहा है ॥१७-१८॥ यह सुनकर साधु स्वभाव उसका पति उस औषधि को लेने के लिए बास की रस्सी बनाकर, उसे वृक्ष से बाँधकर और उसमें लटककर नदी की ओर लटका। रस्सी के सहारे उसके लटकने पर उस कामिनी ने रस्सी को खोलकर फेंक दिया। इस कारण उसका पति नदी में गिरकर तेज धारा में बह गया ॥१९-२०॥ पूर्व पुण्यों से रक्षित उस वैश्यपुत्र को नदी ने दूर तक बहाकर एक किनारे पर ले जाकर पटक दिया ॥२१॥ उस तट से ऊपर को चढ़ता हुआ अपनी स्त्री के कुकर्म को सोचता हुआ और पानी के बहाव से थका-हारा वह वैश्यपुत्र एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा ॥२२॥ उसी समय उस नगर का राजा मर गया। उस देश में प्राचीन समय से यह प्रथा चली आ रही थी कि राजा के मरने पर, पुरवासी माङ्गलिक मत्तगज को घुमाते थे। वह घूमते हुए सूँड़ से उठाकर जिसे अपनी पीठ पर बैठा लेता था वही राजगद्दी पर बैठाया जाता था ॥२३-२४॥ उसी नियमानुसार धैर्य से सम्पुष्ट विधाता के समान वह हाथी वृक्ष के तले बैठे हुए वैश्यपुत्र के पास आया और उसने उसे उठाकर अपनी पीठ पर बैठा लिया ॥२५॥ तब राजा के मन्त्रियों तथा अधिकारियों ने उस वैश्यपुत्र का नगर में ले जाकर उसका राज्याभिषेक कर दिया ॥२६॥ बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न वह वैश्यपुत्र राज्य पाकर मैत्री करुणा मुदिता क्षमा आदि गुणों के साथ राज्यशासन करने लगा। चंचल वृत्तिवाली पापिनी स्त्रियों को उसने दूर ही रखा ॥२७॥ उधर, उसकी पत्नी निःशंक होकर पति का नदी में डूबकर मरा हुआ जानकर, अपने उस जार को पीठ पर चढ़ाकर इधर उधर घूमने लगी ॥२८॥ ११८