भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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षष्ठम लम्बक १४१ मन्त्री गोमुख इस प्रकार कथा कहकर नरवाहनदत्त के लिए फिर यह दूसरी कथा कहने लगा ॥४४॥ बोधिसत्त्व का अंशावतार कोई व्यक्ति किसी वन में पर्णकुटी बनाकर करुणा में सदा एकाग्रचित्त होकर तपस्या करता हुआ रहता था ॥४५॥ वह उस वन में विपद्ग्रस्त प्राणियों और पिपासुओं का उद्धार करता हुआ वन्याश्रय प्राणियों की जल और अन्न से सेवा करता था ॥४६॥ एक बार, दूसरे के उपकार के लिए, जंगलों में घूमते हुए उसने एक भारी कुँआ देखा और उसके भीतर झाँका ॥४७॥ तब उसके भीतर पड़ी हुए एक स्त्री उसे देखकर जोर से बोली—'हे महात्मन्, मैं (स्त्री) सिंह, स्वर्णचूड़ पक्षी और सर्प इस प्रकार हम चार व्यक्ति रात को इस कुएँ में गिर पड़े हैं। अतः कृपाकर हम चारों को निकालो ॥४८-४९॥ यह सुनकर वह महात्मा उस स्त्री से बोला—'तुम तीनों यदि अँधेरे में न दीख पड़ने के कारण गिर पड़े हो तो ठीक है, परन्तु यह पक्षी कैसे गिरा ? ॥५०॥ 'बहेलिये के जाल से बँधा हुआ यह पक्षी भी इसी तरह गिरा'—इस प्रकार उस स्त्री ने उत्तर दिया ॥५१॥ तब उस महात्मा ने अपनी तपस्या के बल से उन्हें ऊपर लाना चाहा, किन्तु वह ऐसा न कर सका। उसकी वह सिद्धि नष्ट हो गई ॥५२॥ 'यह स्त्री पापिनी है, अवश्य ही इससे बात करने से मेरी सिद्धि नष्ट हुई है, अतः दूसरी युक्ति करता हूँ'—यह सोचकर उस महात्मा ने घासों से रस्सी बटकर, उसके द्वारा अपनी दृढमत्ता साबित करते हुए उन सबको कुएँ से बाहर निकाला ॥५३-५४॥ तदनन्तर, आश्चर्य के साथ उसने सिंह, पक्षी और सर्प से पूछा—'तुम्हारी वाणी मनुष्यों के समान क्यों स्पष्ट है और तुम्हारी यह स्थिति क्यों है? बताओ। तब उनमें पहले सिंह बोला—पूर्व जन्म का स्मरण करनेवाले तथा एक-दूसरे के बाधक हम चारों की बात क्रमसे सुनो ॥५५-५६॥ सिंह की आत्म-कथा यह कहकर सिंह ने अपनी कथा शुरू की। हिमालय पर्वत पर वैदूर्यभूम नाम का एक उत्तम नगर है। वहाँ पद्मवेग नाम का विद्याधरों का राजा है। उसको वज्रवेग नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५७-५८॥