कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक १४३ वह वज्रवेग उस विद्याधरनगर में रहता हुआ अपने बल के घमंड से जिस किसी के साथ वैर-विरोध कर लेता था ॥५९॥ पिता के बार-बार मना करने पर भी जब उसने उसकी बात नहीं मानी तब उसके पिता ने उसे शाप दिया कि 'तू मर्त्यलोक में जाकर गिर' ॥६०॥ तब वह मदहीन और विद्या रहित होकर रोता हुआ वज्रवेग अपने पिता से शाप का अन्त करने के लिए प्रार्थना करने लगा ॥६१॥ तब उसके पिता ने क्षणभर सोचकर कहा—'पृथ्वी पर, ब्राह्मण का पुत्र बनकर और वहाँ भी इसी प्रकार मद करने के कारण पुनः पिता के शाप से सिंह बनकर कुएँ में गिरेगा। तब आकर जो महात्मा तुझे निकालेगा उसका प्रत्युपकार करके तू शापमुक्त हो जायगा ऐसा कह कर पिता ने उसके शाप का अन्त बतलाया ॥६२-६४॥ तदनन्तर, वह वज्रवेग मालव देश में हरघोष नामक ब्राह्मण के घर में देवघोष इस नाम से उत्पन्न हुआ। वहाँ भी उसने अपने बल के घमंड से बहुतों के साथ विरोध किया। उसके पिता ने रोका कि 'बहुतों के साथ विरोध न करो' ॥६५-६६॥ किन्तु, उसकी बात न माननेवाले पुत्र को पिता ने शाप दिया कि 'हे बल के घमंडी दुष्टबुद्धि जा अब तू सिंह बन जा' ॥६७॥ तब पिता के शाप से वह देवघोष जो विद्याधर का अवतार था इस वन में सिंह बन गया ॥६८॥ मुझे वही सिंह समझो। दैवयोग से वन में घूमता हुआ मैं रात को इस कूप में गिरा और आज तुझ महात्मा से उबारा गया ॥६९॥ इसलिए, अब मैं जाता हूँ। तुम्हें कहीं पर भी कोई विपत्ति आवे तो मुझे स्मरण कर लेना। उस समय तुम्हारा प्रत्युपकार करके मैं शापमुक्त हो जाऊँगा ॥७०॥ ऐसा कहकर सिंह के चले जाने पर उस बोधिसत्त्व से पूछा गया सुवर्णचूड पक्षी अपना वृत्तान्त कहने लगा ॥७१॥ सुवर्णचूड पक्षी की आत्म कथा हिमालय पर वज्रदंष्ट्र नाम का विद्याधरों का राजा है। उसकी रानी से यथावार पाँच कन्याएं उत्पन्न हुईं ॥७२॥