भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 56 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 40

३८ प्रज्ञा से रहित वाणी किसी नाम को भी नहीं जान सकती। उस समय ऐसा कहा जाता है कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था मैंने उस नाम को नहीं जाना।।२३।। मनोऽभूदित्याह नाहमेतं गन्धं प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेतं चक्षू रूपं चिंन प्रज्ञपयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतद्रूपं प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेतं श्रोतं कंचन प्रज्ञपयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतं शब्दं प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेता जिह्वान्नरसं कंचन प्रज्ञपयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतमन्नरसं प्राज्ञासिषमिति नहीं प्रज्ञापेतौ हस्तौ कर्म किंचन प्रज्ञपयेतामन्यत्र मे मनोज्भूदित्याह नाहमेतत्कर्म प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेतं शरीरं सुखदुःखं किंचन प्रज्ञपयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतत्सुखदुःखं प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेत उपस्थ आनन्दं रतिं ।।२४।। सच है कि प्रज्ञा से रहित घ्राण किसी गंध को भी नहीं जना सकता। ऐसा कहा जाता है कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था, इसलिये मैंने गंध को नहीं जाना। प्रज्ञा से रहित चक्षु किसी रूप को भी नहीं जना सकता वह कहता है कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था इसलिये मैंने रूप को नहीं देखा। प्रज्ञा से रहित श्रोत्र किसी भी शब्द को सुना नहीं सकता, ऐसा कहता है कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था इसलि मैंने शब्द नहीं सुना। प्रज्ञा से रहित जीभ रस के स्वाद को नहीं जना सकती, वह कहता है कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था इसलिये मैंने रस को नहीं जाना। प्रज्ञा से रहित हाथ किसी कर्म को नहीं जना सकता, वह कहता है कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था इसलिये मैंने कर्म को नहीं जाना। प्रज्ञा से रहित शरीर किसी भी सुख दुःख को नहीं जानता। ऐसे कहता है कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था इसलिये मैं इस सुख दुःख को जान न