कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ८५ कपपत्रयासितालकाण्डया हृदये विध्यति ॥२८॥१॥३५॥ सहस्रशृङ्ग इति स्वापनम् ॥१॥ उदपात्रेण सम्पात- वता शालां सम्प्रोक्ष्यापरस्मिन्द्वारपक्षे न्युब्जति ॥२॥ एवं नग्नः ॥३॥ उलूखलमुत्तरां स्रक्तिं दक्षिणशयनपादं तन्तू- नभिमन्त्रयते ॥४॥ अस्थाद् द्यौरिति निवेष्टनम् ॥५॥ आवे- ष्टनेन वंशाग्रमवबध्य मध्यमायां बध्नाति ॥६॥ शयनपा- दमुत्पले च ॥७॥ आकृष्टे च ॥८॥ आकर्षेण तिलाञ्जुहो- ति ॥ ९ ॥ इदं यत्प्रेष्य इति शिरःकर्णमभिमन्त्रयते ॥१०॥ केशान्धारयति ॥ ११॥ भगेन मा न्यस्तिकेदं से दबाता हुआ सोवे ॥२७॥ कुश के काँटे से, भांगव्य से, साहीके काँटे से, उलूक पत्रा से, कालीकण्डा से भार्या की प्रतिरूपाकृति के हृदय स्थान में विद्ध ( गराना ) करे । यह स्त्री ( अपनी ) वशीकरण समाप्त हुआ ॥२८॥१॥३५॥ यह पैंतीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥३५॥ अब स्वापन कर्म को कहते हैं । ( स्त्रीपुरुष के सम्भोग में विघ्न- नाशक कर्म )॥ स्त्री को सोलाने के कर्म को कहते हैं । जलपात्र से सम्पात वाले जल से स्त्री के शाला को संप्रोक्षण करके "सहस्रशृङ्ग०" से शेष जल को घर के दूसरे द्वार पर औंधे पात्र कर धर देवे ॥ इसी प्रकार दूसरे द्वार के कपाट को खोल कर पूर्ववत् करे ॥२॥३॥ उलूखल को, शयनीय घर के उत्तर कोण को और स्त्री के खाट के दहिने पौआ को "सहस्रशृङ्ग०" मंत्र से अभिमंत्रण करे और खाट के रज्जु को अभि- मंत्रण करे ॥४॥ भाग जाने वाली के बन्धन कर्म को कहते हैं ॥ रज्जु- वेष्टन को "अस्थाद् द्यौरस्थात्०" इस दूसरे सूक्त से अभिमंत्रण करके बाँस के अग्रभाग में बान्ध कर मध्यम स्थूणा में बान्ध देवे ॥६॥शयनीय पादको अभिमंत्रण करके उत्पल में उसे बान्ध देवे ॥७॥ इसी प्रकार आकृष्ट ( आग के अंगारों को निकालने के लोहे को ) बान्ध देवे ॥८॥ और कुटका से तिलों की आहुति देवे ॥ ९ ॥ "इदं यत्प्रेष्य०" से शिर (पति या पत्नी के शिर) और कानों को अभिमंत्रण करे। यह जाया एवं पति के क्रोध की शान्ति करने का विधान है ॥१०॥ जिस स्त्री को निरुद्ध करने की इच्छा हो उसको धरे ( पकड़े ) ॥११॥ "भगेन मा०" इत्यादि