कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंऊबध्ये ॥१६॥ श्मशाने ॥१७॥ त्रिरमूनूहनस्वेत्याह ॥१८॥ द्वितीयायाश्मानमूबध्ये गूहयति ॥१९॥ द्वादशरात्रं सर्व- व्रत उपश्राम्यति ॥२०॥ द्विरुदिते स्तुतः ॥२१॥ अवाग- ग्रेण निवर्तयति ॥२२॥ उप प्रागादिति शुने पिण्डं पाण्डुं प्रयच्छति ॥२३॥ तार्क्षं बध्नाति ॥२४॥ जुहोति ॥२५॥ आदधाति ॥२६॥ इदं तद्युजे यत्किं चासौ मनसेत्याहि- ताग्निं प्रतिनिर्वपति ॥२७॥ मध्यमपलाशेन फलीकरणा- ञ्जुहोति ॥२८॥ निरमुमित्यङ्गुष्ठेन त्रिरनुप्रस्तृणाति ॥२९॥ शरं कट्टिन्दुकोष्ठैरनुनिर्वपति ॥३०॥ लोहिताश्वत्थपला- शेन विषावध्वस्तं जुहोति ॥३१॥ त्वं वीरुधामिति मूत्र- गौ में चेष्टा, वध्य के निमित्त हवि करना ॥१४॥१५॥ ऊबध्य को श्मशान में धर कर उस पर बैठ कर "श्रमेण तपसा०” अनुवाक का जप करे । १२ रात तक प्रति दिन जप करे । उसके बाद दो बार सूर्य के उदय होने पर अर्थात् चौदहवां दिन—शत्रु मारा गया जानो ॥२१॥ तब बाँस के दण्ड के अग्रभाग से निवर्तन करे ॥२२॥ "उपप्रागात्०” से श्वेत मिट्टी को अभिमंत्रण कर कुत्ते को देवे ॥२३॥ पलाशमणि लाकर अभिमंत्रण कर उसे बाँधे ॥२४॥ इङ्गिड की आहुति देवे ॥२५॥ समिदाधान करे ॥२६॥ "इदं तद्युजे यत्किंचासौ मनसा०” से आहिताग्नि के प्रति अभिचार करे ॥२७॥ "इदं तद्युजे०” सूक्त के पांच ऋचा से पलाश के मध्यम पत्र से चावल के गुण्डे से आहुति देवे ॥२८॥ "निरमुं०” से अग्नि के पश्चिम भाग में अंगूठे से तीन तह आस्तरण करे ॥२९॥ शर से स्तरण करे, ओडेक, कोष्ट, इङ्गिड, इनमें से एक को हटा देवे और शेष की आहुति देवे ॥३०॥ लाल अश्वत्थ के पत्ते से विषावध्वस्त की आहुति करे ॥३१॥ बाहर लवनादि प्रतिष्ठापनान्त तक करके उस अग्नि को विकाश करे और शर से अग्नि का प्रणयन करे । "निरमुं०” सूक्त से स्तरण करके फिर मंत्र से स्तरण करे । एवं "निरमुं०” सूक्त द्वारा अभ्यातानान्त करके इङ्गिड की आहुति देवे । "त्वं वीरुधां०” से मल मूत्र को बछड़े के शेफ के चमड़े में क्रकच से धर कर बाधक से पीस १६