कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १२३ सपत्नहनमित्यृषभं सम्पातवन्तमतिसृजति ॥ १ ॥ आश्वत्थीरवपन्नाः ॥२॥ स्वयमिन्द्रस्यौज इति प्रक्षाल- यति ॥३॥ जिष्णवे योगायेत्यपो युनक्ति॥४॥ वातस्य रंहितस्यामृतस्य योनिरिति प्रतिगृह्णाति ॥५॥ उत्तमाः प्रताप्याधराः प्रदायैनमेनानधराचः पराचोऽवाचस्तपसस्त- मुन्नयत देवाः पितृभिः संविदानः प्रजापतिः प्रथमो देवता- नामित्यतिसृजति ॥ ६ ॥ इदमहं यो मा प्राच्या दिशो- ऽघायुरभिदासार्दपवादीदिषूगुहः तस्येमौ प्राणापानावप- क्रामामि ब्रह्मणा ॥७॥ दक्षिणायाः प्रतीच्या उदीच्या ध्रुवाया व्यध्वाया ऊर्ध्वायाः ॥८॥ इदमहं यो मा दिशाम- न्तर्देशेभ्य इत्यपक्रामामीति ॥९॥ एवमभिष्ठा ॥१०॥ नापो- क्षीरौदन शत्रु के लिये खाने को देवे और कच्चे पात्र में हाथ धोवे ॥४१॥४२॥४३॥२॥४८॥ यह अड़तालिसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥ “सपत्नहनं०” सूक्त से सम्पातवन्त करके ऋषभ ( वृषभ ) को वृषो- त्सर्ग की भाँति छोड़े। इसका विधि आगे कहा जाता है। स्वयं पतित (अपने आप गिरे हुए) अश्वत्थ की लकड़ियों की समिधा बनावे ॥१॥२॥ “स्वयमिन्द्रस्यौज०” से प्रक्षालन करे ॥३॥ “जिष्णवे योगाय०” से जल लावे ॥ “वातस्य रंहितस्यामृतस्य योनिः०” से जल ग्रहण करे ॥५॥ उद्- वज्रों के विधान को कहते हैं । “इन्द्रस्यौज०” से दूर्वा डाले घट को जल से प्रक्षालन करे । “जिष्णवे योगाय” इत्यादि से छः जल भरे घड़ों को जल के पास रक्खे । एवं “इदमहं यो मा प्राच्या दिशः०” से आठ ऋचा वाले कल्पज सूक्त से जल में घड़े को डाले । “इदमहं०” से घड़े से उदक में “इदमहं०” सूक्त से घड़े के मुख को जल में डुबावे और “इदमहं यो मा प्राच्या दिशः०” सूक्त से घड़े में जल भर कर लौट आकर “इदमहं०” सूक्त से उसे मण्डप में स्थापना करे--इस भाँति अभिचार कर्म में जल का लाना होता है । जिस नियम से वज्र प्रहरण किया जाता है उसे कहते हैं । “इन्द्रस्य०” इत्यादि से सब क्रियाओं को करके “इदमहं०” से स्थापनान्त तक करके “अग्नेर्भाग०” इत्यादि आठ