कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १४९ ध्यमानम् ॥२४॥ परेहि नारीत्युदहृतं संप्रेष्यत्यनुगुप्ता- मलंकृताम् ॥२५॥ एमा अगुरित्यायतीमनुमन्त्रयते ॥२६॥ उत्तिष्ठ नारीति पत्नीं संप्रेष्यति ॥२७॥ प्रतिकुम्भं गृभायेति प्रतिगृह्णाति ॥२८॥ ऊर्जो भाग इति निदधाति ॥२९॥ इयं महीति चर्मास्तृणाति प्राग्ग्रीवमुत्तरलोम ॥३०॥ पुमान् पुंस इति चर्मारोहयति ॥३१॥ पत्नी ह्वयमानम् ॥३२॥ तृतीयस्यामपत्यमन्वाह्वयति ॥३३॥ ऋषिप्रशि- ष्टेत्युदपात्रं चर्मणि निदधाति ॥ ३४ ॥ तदापस्पुत्रास इति सापत्यावनुनिपद्येते ॥३५॥१॥६०॥ प्राचीं प्राचीमिति मन्त्रोक्तम् ॥१॥ चतसृभिरुदपात्र- निष्ठा०” तीन ऋचा अग्नि उत्पन्न होने पर “समिद्धोऽग्न०” से समिधा डालते समय पढ़े “उत्तमं नाकं०” से दाता को पाद करके बचवावे और ब्रह्मोदनिक अग्नि को मथन करके स्थण्डिल में डालकर “यद्देवा०” इत्यादि से पूर्ण होम करे । पूर्ण होम का विधान शान्ति कल्प में कहा गया है । ‘यद्देवा देवहेडनं०’ इस अनुवाक से आज्य की आहुति देवे और समिद् का आधान करे या शाकलों को डाले। इसी प्रकार ब्रह्मोदनिक अग्नि को साल भर जलावे या अहोरात्र भर या जैसी इच्छा हो वैसा करे । संवत्सर तो प्रशस्त है । अब अमावास्या को प्रातःकाल उठकर जल लावे । साधु वादिनी ब्रह्मणी को अलंकृता करके उसके हाथ में उदकघट पकड़वा कर भेजे ॥२५॥ “एमा अगुः” से उसके आते समय अनुमंत्रण करे ॥ २६ ॥ “उत्तिष्ठ नारी०” से पत्नी को संप्रेषण करे ॥२७॥ प्रतिकुम्भ के लेते समय “गृभाय०” ऐसा कहकर ग्रहण करे ॥२८॥ “ऊर्जो भाग०” से कुम्भ को भूमि पर घरे ॥२९॥ “इयं महि०” से चर्म को पूर्व को ग्रीवा एवं उत्तर लोम करके बिछावे ॥३०॥ “पुमान् पुंसः” से चर्म पर चढ़े ॥३१॥ पत्नी को बुलावे ॥३२॥ और तीसरी ऋचा से पुत्र को बुलावे ॥३३॥ “ऋषिप्रशिष्ट०” से उदपात्र को चर्म पर घरे ॥३४॥ “तदापस्पुत्रास०” से पत्नी पति के पीछे बैठे ॥ ३५ ॥ १ ॥ ६० ॥ यह साठवी कंडिका समाप्त हुई ॥ “प्राचीं प्राचीं०” से प्रत्येक दिशा का उपस्थान (जिस दिशा का