कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ॥४॥ चतुर्थ्योपसमादधाति ॥५॥ यत्त्वा क्रुद्धा इति चों भूर्भुवः स्वर्जनदोमित्यङ्गिरसां त्वा देवानामादित्यानां व्रतेनादधे ॥ द्यौर्मह्यासि भूमिर्र्भूम्ना तस्यास्ते देव्यदिति- रुपस्थेऽन्नादायान्नपत्याया दधदिति ॥६॥ लक्षणे प्रतिष्ठा- प्योपोत्थाय ॥७॥ अथोपतिष्ठते ॥८॥ अग्ने गृहपते सुगृह- पतिरहं त्वयाग्ने गृहपतिना भूयासम् ॥ सुगृहपतिस्त्वं मयाग्ने गृहपतिना भूयाः । अस्थूरि णौ गार्हपत्यानि दीदिहि शतं समा इति ॥६॥ व्याकरोमीति गार्हपत्य- क्रव्यादौ समीक्षते ॥१०॥ शान्तमाज्यं गार्हपत्यायोप- निदधाति ॥११॥ माषमन्थं क्रव्यादम् ॥१२॥ उप त्वा नमसेति पुरोऽनुवाक्या ॥१३॥ विश्वाहा त इति पूर्णा- हुतिं जुहोति ॥१४॥ यो नो अग्निरिति सह कर्त्रा हृद- यान्यभिमृशन्ते ॥१५॥२॥७०॥ अंशो राजा विभजतोमावग्नी विधारयन् ॥ क्रव्या- दं निर्णुदामसि हव्यवाडिह तिष्ठत्विति विभागं ज- पति ॥१॥ सुगार्हपत्य इति दक्षिणेन गार्हपत्ये समिध- मादधाति ॥२॥ यः क्रव्यात्तमशीशममिति सव्येन नड- जलावे ॥२॥३॥४॥ और चौथी से अन्वाधान करे ॥५॥ “यत्त्वा क्रुद्धा०” और “ॐ भूर्भुवः०” इत्यादि से रेखा पर प्रतिष्ठापन करके और उठ कर उपस्थान करे ॥६॥७॥८॥ “अग्ने गृहपते०” इत्यादि ॥९॥ और “व्याक- रोमि०” इन दोनों से गार्हपत्य और क्रव्याद अग्नि को देखे ॥१०॥ शान्त आज्य को गार्हपत्य के लिये धरे ॥११॥ माष (उड़ीद) का मन्थ क्रव्याद् के लिये ॥१२॥ “उप त्वा नमस०” पुरोऽनुवाक्या ॥१३॥ “विश्वाहा०” से पूर्णाहुति देवे ॥१४॥ “यो नो अग्निः” से कर्त्ता के साथ हृदयों को यजमान एवं पत्नी अभिमर्शन करे ॥१५॥ २॥७०॥ यह सत्तरवि कण्डिका समाप्त हुई । “अंशो राजा०” इत्यादि से विभाग को जप करे ॥१॥ “सुगार्ह- पत्य०” से दक्षिण से गार्हपत्य अग्नि में समिद् का आधान करे ॥२॥