भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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परायापयति ॥२८॥ अतः पित्र्युपवीती यज्ञोपवीती यन्न इदं पितृभिः सह मनोऽभूत्तदुपान्हयामसीति मन उपाह्वयति ॥२९॥६॥८८॥ मनो न्वाव्हामहे नाराशंसेन स्तोमेन ॥ पितॄणां च मन्मभिः ॥ आ न एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय ॑जीवसे ज्योक्च सूर्यं दृशे ॥ पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यः जनः ॥ जीवं व्रातं सचेमहि ॥ वयं सोम व्रते तव मनस्त- नूषु बिभ्रतः । प्रजावन्तः सचेमहि ॥ ये सजाताः सुमनसो जीवा जीवेषु मामकाः । तेषां श्रीर्मयि कल्प- तामस्मिन्गोष्ठे शतं समा इति ॥१॥ यच्चरुस्थाल्यामोद- नावशिष्टं भवति तस्योष्मभक्षं भक्षयित्वा ब्राह्मणाय दद्यात् ॥२॥ यदि ब्राह्मणो न लभ्येताप्स्रवभ्यवहरेत् ॥३॥ निजाय दासायेत्येके ॥४॥ मध्यमपिण्डं पत्न्यै पुत्रकामाय प्रयच्छति ॥५॥ आधत्त पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम् । यथेह पुरुषोऽसत् ॥ आ त्वारुक्षद्वृषभः पृश्निरप्रियो मेधा- विनं पितरो गर्भमादधुः ॥ आ ह्वायं पुरुषो गमेत्पुरुषः पुरुषादधि । स ते श्रैष्ठ्याय जायतां स सोमे साम गायत्विति ॥६॥ यद्यन्या द्वितीया भवत्यपरं तस्यै ॥७॥ पितरों का उपस्थान करे ॥ २५ ॥ २६ ॥ “अक्षन्न०” से उत्तरसिच को धोकर । “परायात०” से परायापन करे ॥ २८ ॥ “यन्न इदमिति मनो न्वाव्हामह” इत्यादि सूक्त के मन्त्रों को हृदय को छूकर जप करे ॥ २९ ॥ ६ ॥ ८८ ॥ यह अट्ठासिवी कण्डिका समाप्त हुई । “मनो न्वाव्हामहे” इत्यादि का जप करे ॥१॥ जो चरुस्थाली में ओदन रह जावे उसका ऊष्म भक्षण कराकर ब्राह्मण के लिये दे देवे ॥२॥ यदि ब्राह्मण न मिलें तो उसे जल में डाल देवे ॥३॥ अपने दास को दे देवे ऐसा किन्हीं आचार्यों का मत है ॥४॥ मध्यम पिण्ड को पुत्र की इच्छा वाली पत्नी के लिये देवे ॥५॥ “आधत्त पितरो गर्भं०” इत्यादि