कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा सू०। कोष्ठबद्ध और प्रस्त्राव विरुद्ध में मंत्र । इसी सूक्त में परवर्त्ती काल चिकित्सकों का बस्ति यन्त्र की नाईं एक प्रकार के तृण की सहायता से चिकित्सा विषय का उल्लेख है। कौशिक सू० में इस विषय की जो विस्तृत व्यवस्था है, उसका अनुवाद नीचे दिया हुआ है। कौशिक सूत्र ( २५।१०।१९ ) इन मंत्रों के उच्चारण करते समय मूत्र का वेग जिसमें हो, ऐसा द्रव्य रोगी के शरीर में बान्ध देवे। उसके बाद दीमक की माटी पूतिका ( Guilandina bonduc ) सूखा गुण्डान प्रमन्द और काठ का गुँडा जल में भिंजा कर वही जल रोगी को पीने को देवे। इस सूक्त का शेष दो मंत्र उच्चारण करते २ मलद्वार में एक शलाका— एक सलाई ( Enema ) प्रवेश करा देवे। उसके बाद मूत्रनाली में शलाका दिलवा दे। शेष रोगी को आल, पद्म का शिकड़ और उल इन तीन द्रव्यों का पाचन सेवन करने को देवे। कोष्ठबद्ध होने पर भी इसी प्रकार व्यवस्था है। १६ सूक्त। सीसा का ताबीज। भूतों को भगाने के लिये व्यवस्था है। १७ सूक्त रुधिर गिरने को रोकने के लिये मंत्र। टीकाकार गण कहते हैं जो रक्त स्राव का अर्थ कटने से रक्तस्राव और अत्यधिक रजो- निस्सरण ये दोनों समझना होगा। इन मंत्रों के सहित कौशिक सूत्र (२६।१०) धूलि और पत्थर का चूर्ण जखम की जगह चढ़ा देने से रक्त बन्द करने की व्यवस्था दी है। २२वें सू०। पाण्डु ( कामला—केशव की टीका ) रोग के प्रति मंत्र। इस सूक्त में विशेष कोई जानने के लिये भेषज का उल्लेख नहीं। कौशिक सूत्र में ( २६, १४) इस मंत्र के साथ करणीय प्रक्रिया का विवरण है। २३।२४ सूक्त। श्वेत कुष्ठ रोग के प्रति मंत्र। रजनी ( हरिद्रा ) ( Cacuma longer ) इस रोग को दूर करने के लिये उल्लिखित हुई है। आयुर्वेद ग्रंथों में कुष्ठ रोग में हरिद्रा का व्यव- हार अधिकता से हुआ है। कौशिक सूत्र में (२६।२२।२४) मंत्रों के साथ करणीय आनुषङ्गिक प्रक्रिया वर्णित हुई है। सायनाचार्य और केशव ने अपनी २ टीका में कुष्ठ के लिये भृङ्गराज, हरिद्रा, इन्द्रवारुणी, और नीलिका का उल्लेख किया है। २५ सू०। तक्षण ( ज्वर ) इस सूक्त का और नीचे लिखे सूक्तों का विषय ५ का० ४ सूक्त, २२ सूक्त; ६ का० २० सू०, ९५ सू०, ३ सू०, १०२ सू०, ११६ सू०; १९ का० ३९ सू०। सुश्रुत जैसे ज्वर को रोगों का राजा कहा है उसी प्रकार अथर्ववेद में “तक्षण” को सबकी अपेक्षा भयानक कह कर लिखा है। इन सब सूक्तों में ज्वर के लक्षणादि भली-भांति स्पष्ट हुआ है। लक्षणादि मलेरिया