कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३१ हेति हुत्वा ॥३॥ समास्त्वाग्न इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥४॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥५॥१०॥१०२॥ अथ यत्रैतदुपतारकाः शङ्कन्ते तत्र जुहुयात् ॥ १ ॥ रेवतीः शुभ्रा इषिरा मदन्तीस्त्वचो धूममनु ताः संवि- शन्तु । परेणापः पृथिवीं सं विशन्त्वाप इमां लोकाननु संचरन्तु ॥ अद्भ्यः स्वाहेति हुत्वा ॥ २ ॥ समुत्पतन्तु प्रनभस्वेति वर्षोर्जुहुयात् ॥ ३ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥११॥१०३॥ अथ यत्रैतद्ब्राह्मणा आयुधिनो भवन्ति तत्र जुहु- यात् ॥१॥ य आसुरा मनुष्या आत्तधन्वः पुरुषमुखाश्च- रानिह । देवा वयं मनुष्यास्ते देवाः प्रविशामसि । इन्द्रो नो अस्तु पुरोगवः स नो रक्षतु सर्वतः । इन्द्राय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ मा नो विदन्नमो देववधेभ्य इत्येता- भ्यां सूक्ताभ्यां जुहुयात् ॥ ३ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥१२॥१०४॥ देकर ॥ २ ॥ ३ ॥ “समास्त्वाग्न०” इस सूक्त से आहुति देवे ॥ ४ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ५ ॥ १० ॥ १०२ ॥ यह एक सौ दूसरी कण्डिका समाप्त हुई । अब जहां यह उपतारकाओं की शङ्का होती है, तहां आहुति देवे ॥ ॥ १ ॥ “रेवतीः शुभ्रा इषिरा०” इत्यादि से आहुति देवे ॥ ३ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ४ ॥ ११ ॥ १०३॥ यह एक सौ तीसरी कण्डिका खतम हुई । अब जहां ब्राह्मणलोग अस्त्रधारी होते हैं, तहां आहुति देवे ॥ १ ॥ “य आसुरा मनुष्या०” इत्यादि से आहुति देकर ॥ २ ॥ “मा नो विदन्नमो०” इत्यादि दो सूक्तों से आहुति देवे ॥ ३ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ४ ॥ १२ ॥ १०४॥ यह एक सौ चारवी कण्डिका खतम हुई ।