भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २४३ यत्र लोकस्तत्रेमं यज्ञं यजमानं च घेहि ॥ वनस्पतये स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ वनस्पतिः सह देवैर्न आगन्निति जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥३३॥१२५॥ अथ यत्रैतद्दिवोल्का पतति तद्योगक्षेमाशङ्कं भवत्यवृष्ट्याशङ्कं वा ॥१॥ तत्र राजा भूमिपतिर्विद्वांसं ब्रह्माणं वृणीयात् ॥२॥ स वृतोऽरण्यस्यार्धमभिव्रज्य तत्र द्वादशरात्रमनुशुष्येत् ॥३॥ स खलु पूर्वं नवरात्रमार- ण्यशाकमूलफलभक्षश्चाथोत्तरं त्रिरात्रं नान्यदुदकात् ॥ ॥ ४ ॥ श्वो भूते सप्तधेनव उपकॢप्ता भवन्ति श्वेता कृष्णा रोहिणी नीली पाटला सुरूपा बहुरूपा सप्तमी ॥ ५ ॥ तासामेतद्द्वादशरात्रं सन्दुग्धं नवनीतं निदधाति ॥६॥ द्वादश्याः प्रातर्यत्रैवासौ पतिता भवति तत उत्तर- मग्निमुपसमाधाय ॥७॥ परिसमुह्य पर्युँक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिः ॥८॥ अथामुं नवनीतं सौवर्णे पात्रे विलाप्य सौव- ऽच्छतशाखो०” इत्यादि से आहुति करके ॥२॥ “वनस्पतिः सह देवैर्न०” से आहुति करे ॥३॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥३३॥१२५॥ यह एकसौ पचीसवी कण्डिका खतम हुई । अब जहां दिन में उल्कापात होवे, वहां योग क्षेम होने में शङ्का है या अवृष्टि की शङ्का होगी ॥१॥ वहां राजा या भूमिपति विद्वान् ब्राह्मण को बुलाकर वरण करे ॥२॥ वह वृत हो वन के आध भाग में जाकर वहां १२ रात तपस्या करे ॥३॥ वह पहिले नौ रात वन्य शाक, फल, मूल खाकर निर्वाह करे और अन्तिम तीन रात फलादि भी न खावे, केवल जल पीकर रहे ॥४॥ प्रातः काल होते ही सात धेनु एकत्र करे । सफेद, काली, रोहिणी, नीली, पाटला, सुरूपा, बहुरूपा सप्तमी ॥५॥ उनका दूध एवं नवनीत १२ रात लेकर रखे ॥६॥ द्वादशी के प्रातःकाल में जहां, उल्का का पतन होता है उससे उत्तर में अग्न्याधान करके परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके और बर्हि लाकर धरे ॥८॥