भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३ ॥२८॥ या पूर्वा पौर्णमासी सानुमतिर्योत्तरा सा राका ॥२९॥ या पूर्वामावास्या सा सिनीवाली योत्तरा सा कुहूः ॥३०॥ अद्योपवसथ इत्युपवत्सद्भक्तमश्नाति ॥३१॥ मधुलवणमांसमाषवर्जम् ॥ ३२ ॥ ममाग्ने वर्च इति समिध आधाय व्रतमुपैति ॥३३॥ व्रतेन त्वं व्रतपत इति वा ॥३४॥ ब्रह्मचारी व्रत्यधः शयीत ॥३५॥ प्रातर्हुतेऽग्नौ कर्मणे वां वेषाय वां सुकृताय वामिति पाणी प्रक्षाल्या- परेणाग्नेर्दर्भान्नास्तीर्य तेषूत्तरमानडुहं रोहितं चर्म प्राग्- ग्रीवोत्तरलोम प्रस्तीर्य पवित्रे कुरुते ॥ ३६ ॥ दर्भावप्र- च्छिन्नाग्रान्तौ प्रक्षाल्यानुलोममनुमार्ष्टि विष्णोर्मनसा पूते स्थ इति ॥ ३७ ॥ १ ॥ त्वं भूमिमस्त्येष्योजसा त्वं वेद्यां सीदसि चारुरध्वरे। त्वां पवित्रमृषयो भरन्तस्त्वं पुनीहि दुरितान्यस्मदिति युक्त पौर्णमासी को अनुमति और परिवा युक्त पौर्णमासी को राका कहते हैं ॥२९॥ चतुर्दशी युक्त अमावास्या को सिनीवाली और परिवा युक्त अमावास्या को कुहू कहते हैं ॥३०॥ चतुर्दशी युक्त पौर्णमासी पूर्वा कह- लाती है और परिवा युक्त उत्तरा कहलाती है। इसी प्रकार पूर्वा अमावास्या को उपवास करे एवं उत्तरा अमावास्या को यज्ञ करे ॥ और उपवास करने वाला भात खावे ॥ और क्षार लवण, मांस, उड़ीद को न खावे ॥३१॥३२॥ “ममाग्ने वर्च०” इत्यादि पढ़कर समिध लेवे एवं व्रत करे ॥३३॥ या “व्रतेन त्वं व्रतपत०” से करे ॥३४॥ व्रत करनेवाला ब्रह्मचारी भूमि पर सोवे, खाट आदि पर नहीं ॥३५॥ प्रातःकाल की आहुतियाँ अग्नि में डालकर “कर्मणे वां०” इत्यादि मंत्र से लाल रंग के बैल के चर्म को पूर्व की ओर गला और ऊपर को लोम भाग करके बिछाकर कुश के पवित्रे को बनावे ॥३६॥ कुशों के प्रान्त भाग को तोड़कर जल से प्रक्षालन कर “विष्णोर्मनसा पूते स्थ०” मंत्र से अनुमार्जन करे ॥३७॥ यह प्रथम कण्डिका समाप्त हुई ॥१॥ “त्वं भूमि मत्स्येष्योजसा०” इत्यादि मंत्र से पवित्रे को चमड़े और