कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तिष्ठतेत्यैन्द्रम् ॥४०॥ अग्निर्भूम्यामिति तिसृभिरुपस- मादधात्यस्मै क्षत्राण्येतमिध्ममिति वा ॥४१॥२॥ युनज्मि त्वा ब्रह्मणा दैव्येन हव्यायास्मै वोढवे जात- वेदः । इन्धानास्त्वा सुप्रजसः सुवीरा ज्योग्जीवेम बलि- हृतो वयं त इति ॥१॥ दक्षिणतो जाङ्ग्यायनमुदपात्रमुप- साद्याभिमन्त्रयते तथोदपात्रं धारय यथाग्रे ब्रह्मणस्पतिः ॥ सत्यधर्मा अदीधरद्देवस्य सवितुः सव इति ॥२॥ अथो- दकमासिञ्चति, इहेत देवीरमृतं वसाना हिरण्यवर्णा अन- वद्यरूपाः । आपः समुद्रो वरुणश्च राजा संपातभागान् हविषो जुषन्ताम् ॥ इन्द्र प्रशिष्टा वरुणप्रसूता अपः समुद्राद्दिवमुद्वहन्तु । इन्द्रप्रशिष्टा वरुणप्रसूता दिव- स्पृथिव्याः श्रियमा वहन्त्विति ॥३॥ ऋतं त्वा सत्येन प- रिषिञ्चामि जातवेद इति सह हविर्भिः पर्युक्ष्य जीवाभि- राचम्योपोत्थाय वेदप्रपद्भिः प्रपद्यत ओं प्रपद्ये भूः प्रपद्ये भुवः प्रपद्ये स्वः प्रपद्ये जनत्प्रपद्य इति ॥४॥ प्रपद्य पश्चा- हस्तीर्णस्य दर्भानास्तीर्याहे दैधिषव्योदतस्तिष्ठान्यस्य सदने
भाषार्थ—“उत्तिष्ठत०” से ऐन्द्रहवि को देखे ॥४०॥ “अग्निर्भूम्यां०” इत्यादि तीन ऋचाओं से आधान करे । या “अस्मै क्षत्राण्येत०” से इध्म को देखे ॥४१॥४२॥ यह दूसरी कण्डिका समाप्त हुई ॥ २ ॥ “युनज्मिन्त्वे०” इन पाँच ऋचाओं से इध्म का आधान करे । और काँसे का पात्र लाकर “तथोदपात्रं धारय०” इत्यादि मंत्र से अभिमंत्रण करे ॥१॥२॥ अन्य जल से “इहेत देवी०” इत्यादि मंत्रों को पढ़ कर आसिंचन करे ॥३॥ “ऋतं त्वा सत्येन०” इत्यादि से हवि के साथ पर्युक्षण कर के “जीवास्थ०” इत्यादि चार मंत्रों से एक बार जल भक्षण करे, कर्त्ता और ब्रह्मा जल से आचमन करे॥ उपोत्थाय वचन से मंत्र की प्रतीति कराई गई है । और “वेदप्रपद्भिः” से प्रपद् करे ॥ “ओं प्रपद्ये भूः०” इत्यादि से प्रपद् करावे ॥४॥ प्रपद् कराके पश्चिम भाग में बिछाये हुए