कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ॥ ३२ ॥ अधिश्रयणपर्यग्निककरणाभिघारणोद्वासनालङ्क- रणोत्पवनैः संस्कृत्य ॥३३॥ अथापि श्लोकौ भवतः ॥ आज्यभागान्तं प्राक् तन्त्रमूर्ध्वं स्विष्टकृता सह । हवींषि यज्ञ आवापो यथा तन्त्रस्य तन्तवः । पाकयज्ञान् समा- साद्यैकाज्यानैकबर्हिषः । एकस्विष्टकृतः कुर्यान्नानापि सति दैवतेति ॥३४॥ एतेनैवामावास्यो व्याख्यातः ॥३५॥ ऐन्द्राग्नोऽत्र द्वितीयो भवति ॥ ३६ ॥ तयोर्व्यतिक्रमे त्वमग्ने व्रतपा असि कामस्तदग्र इति शान्ताः ॥३७॥६॥ अश्नात्यनादेशे स्थालीपाकः ॥ १ ॥ पुष्टिकर्मसु सारू- पवत्से ॥२॥ आज्यं जुहोति ॥३॥ समिधमादधाति ॥४॥ अधिश्रयण, पर्यग्निकरण, अभिघारण, उद्वासन, अलङ्करण, और उत्पवन आदि संस्कार करके आहुति देवे ॥ ३२॥३३ ॥ यहाँ दो श्लोक गोपथ ब्राह्मणों के हैं । आज्य भाग के अन्त के होम पूर्वतन्त्र स्विष्ट कृत के सहित हवियों के यज्ञ, यह आवाप (प्रधान) है । और जैसे तन्त्र की सन्तति वा सूत्र स्वरूप है। यदि पाक यज्ञ के करने में ऐसा अवसर आ पड़े कि एक आज्य हो और अनेक बर्हि । (हवि रखने के कुश के पात्र) हों तो एक ही स्विष्टकृत की आहुति करे । चाहे भिन्न २ अनेक दैवत हवन क्यों न हों ॥३४॥ इसीके द्वारा अमा- वास्या में कर्त्तव्य ऐन्द्राग्नि की व्याख्या हुई जानो ॥३५॥ यहाँ ऐन्द्राग्न दूसरा है जानो ॥३६॥ इन दोनों के व्यतिक्रम होने पर “त्वमग्ने व्रतपा असि”, “कामस्तदग्र०” से शान्ता नाम की आहुति करनी चाहिये ॥३७॥ यह छठी कण्डिका पूरी हुई ॥ ६ ॥ इस संहिता विधि में जहाँ २ “अश्नाति” या “आशयति” करके कहा गया है वहाँ २ स्थालीपाक की विधि जानना ॥ १ ॥ जैसे पुष्टि कर्मों में “सारूपवत्सा” स्थालीपाक समझना ॥२॥ जहाँ “जुहोति” कहा गया है परन्तु हवन करने का विधान नहीं किया गया वहाँ घृत समझना ॥३॥ जहाँ होम का विधान हो परन्तु होतव्य (किस वस्तु का होम करे सो नहीं लिखा है) वहाँ आज्य की आहुति करे ॥ ३ ॥ जहाँ केवल