भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३१ न्तानि ॥७॥ त्वया वयमित्यायुधिग्रामण्ये ॥८॥ नि तह- धिष इति राज्ञोदपात्रं द्वौ द्वाववेक्षयेत् ॥६॥ यन्न पश्येन्न युध्येत ॥ १० ॥ नि तद्दधिषे वनस्पते ऽद्याविष्ठाग्न इन्द्रो दिशश्चतस्र इति नवं रथं राजानं ससारथिमास्थापयति ॥११॥ ब्रह्म जज्ञानमिति जोवितविज्ञानम् ॥१२॥ तिस्रः स्नाव्रज्जूरङ्गारेष्ववधाय ॥१३॥ उत्कुचतीषु कल्याणम् ॥१४॥ साङ्ग्रामिकमेता व्यादिशति मध्ये मृत्युरितरे सेने ॥१५॥ पराजेष्यमाणान्मृत्युरतिवर्तते ज्येष्यन्तो मृत्युम् ॥१६॥ अग्रेषूत्कुचत्सु मुख्या हन्यन्ते मध्येषु मध्या अन्तेष्ववरे ॥१७॥ एवमिषीकाः ॥१८॥६॥१५॥ तक करे ॥७॥ “त्वयावयं०” इत्यादि अस्त्र पर ग्राम में करें ॥८॥ अपनी सेना का जय पराजय और पुरुषों के मारे जाने की शंका में इसका विज्ञान यह है कि राजा अपने जलपात्र को अभिमंत्रण करके दो २ योद्धाओं को राजा देखे जिसको न देखे अर्थात् रहते हुए जो न दीख पड़े उसको न लड़ने देवे ॥९॥१०॥” नितद्दधिषे०” इत्यादि मंत्र पढ़ कर नये रथ को तय्यार कर पुरोहित राजा को उस पर सवार करावे ॥११॥ रोगी पुरुप के अच्छा होने का ज्ञान होने की विधि-पुरोहित “ब्रह्मजज्ञानं०” इत्यादि से जीवित ज्ञान के लिये कि यह रोगी जीवित रहेगा या नहीं ? इस संशय में तत्त्व जानने की चिन्ताकरके चमड़े के ताँत की तीन रज्जू को आग में डाल कर चिन्ता करे कि यह जीयेगा या नहीं ? यदि अङ्गार में की ज्वाला ऊपर को उठे तो जानना यह रोगी जीवेगा ॥१४॥ अब सांग्रामिक विधान को कहते हैं-तीन रज्जुओँ में से एक अपनी सेना की रज्जू दूसरी मध्य में मृत्यु सूचक तीसरी रज्जू पर सेना सूचक हो । इस प्रकार संकल्प करके आग में तीनों रज्जुओं को डालकर जिसके ऊपर मृत्यु वाली रस्सी जावे उसकी सेना का जय होगा ॥१५॥१६॥ मृत्यु रज्जुके आगे सरपत की तीन इषिका अग्नि में डाले यदि पहिली इषिका-जल कर ऊपर को उठे तो सेना के प्रधानों की मृत्यु जानो, मध्यम इषिका फल-सेना के मध्यम पुरुषों की मृत्यु जानो