भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ४५ सायां निवपति ॥२०॥ अभ्यज्योत्तरफालं प्रातरायोजनाय निदधाति ॥२१॥ सीताशिरःसु दर्भानास्तीर्य प्लक्षौदुम्ब- रस्य त्रींस्त्रींश्चमसान्निदधाति ॥२२॥ रसवतो दक्षिणे शष्पवतो मध्यमे पुरोडाशवत उत्तरे ॥२३॥ दर्भान् प्रत्य- वभज्य संवपति ॥२४॥ सारूपवत्से शकृत्पिण्डान् गुग्गुलु- लवणेप्रतीनीयाश्नाति ॥२५॥अनडुत्सांपदम् ॥२६॥३॥२०॥ पयस्वतीरिति स्फातिकरणम् ॥१॥ शान्तफलशिला- कृतिलोष्टवल्मीकराशिवापं त्रीणि कूदीप्रान्तानि मध्य- मपलाशे दर्भेन परिवेष्ट्य राशिपल्येषु करोति ॥२॥ सायं भुञ्जते ॥३॥ प्रत्यावपन्ति शेषम् ॥४॥ आ भक्तयातनात् लेती हूं ॥१९॥ बीच के सीरवर में के ढेला को वरे । और उत्तर देश में अश्विनौ देवता को स्थालीपाक से पूजे ॥२०॥ पूजाकर उस उत्तर सम्पादि संस्कृत जल से दूसरे दिन प्रातःकाल आयोजना होगी उसके लिये रख छोड़े ॥२१॥ सीता के शिर पर कुशों को आस्तरण करके प्लक्ष, गूलर के तीन २ इध्म को डाले ॥२२॥ रसवाले दक्षिण में शष्पवाले बीच में पुरोडाश वाले उत्तर में डाले ॥२३॥ कुशों को टेढा करके चमसों पर डाले ॥२४॥ सरूपवत्सा गौ के गोबर के पिण्डों को गुग्गुल लवण में मिलाकर खावे ॥२५॥ अनडुत्साम्पद् (हमको बहुत बैल हो एसी इच्छावाले) करे ॥२६॥३॥२०॥ यह बीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥२०॥ “पयस्वतीः०” इत्यादि से स्फातिकरण (किसी पदार्थ की वृद्धि) कर्म को करे ॥१॥ शान्तफल, शिलाकृति, मट्टी का ढेला, दीमक के मट्टी के ढेर को तीन कूदीप्रान्तों को, पलाश के पत्ते में कुश के साथ लपेट कर बान्धे और अन्न के ढेर पर या वखार में धरे ॥२॥ अन्न को नाप कर सायंकाल में भोजन करे ॥३॥ मनुष्य के हिसाब से अधिक कोष्ठागार में धरे और शेष को आहुति करे ॥४॥ जब २ भात पकावे, तब २ उसे अभिमंत्रित करे । और जब २ छाटने, कूटने, साफ करने, रंधन करने, परीक्षण करने, छन देने का काम करे तब २ उसे अभिमंत्रण करे ॥५॥