कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्दस्य प्राशिषमिति मध्यन्दिने ॥३॥ अपराह्नस्य तेजसा सर्वमन्नस्य प्राशिषमित्यपराह्ने ॥४॥ ऋतु- मत्या स्त्रिया अङ्गुलिभ्यां लोहितम् ॥५॥ यत् क्षेत्रं काम- यते तस्मिन् कीलालं दधिमधुमिश्रम् ॥६॥ संवत्सरं स्त्रियमनुपेत्य शुक्त्यां रेत आनीय तण्डुलमित्रं सप्तग्रामम् ॥७॥ द्वादशीममावास्येति क्षीरभक्षो भवत्यमावास्यायां दधिमधुभक्षस्तस्य मूत्र उदकदधिमधुपल्पूलनान्यासिश्च्य ॥८॥ क्रव्यादं नाडी प्रविवेशाग्निं प्रजाभाङ्गिरतो माययैतौ । आवां देवी जुषाणे घृताची इममन्नाद्याय प्रविशतं स्वाहेति ॥६॥ निशायामाग्रयणतण्डुलानुदक्यान्मधु- मिश्रान्निदधात्या यवानां पङ्क्तेः ॥१०॥ एवं यवानुभया- न्समोप्य ॥११॥ त्रिवृति गोमयपरिचये शृतमश्नाति ॥१२॥ “मध्यन्दिनस्य तेजसा मध्यमन्नस्य प्राशिषम्” इत्यादि से मध्यान्ह में आहुति देवे ॥ ३॥ “अपराह्नस्य तेजसा सर्वमन्नस्य प्राशिषम्” इत्यादि से अपराह्न समय आहुति देवे ॥४॥ ऋतुमती स्त्री को गर्भकाल युक्त होने से उसके योनि से रुधिर निकलता है उस रुधिर को तर्जनी एवं मध्यमा अङ्गुलियों से अपने कुल की पुष्टि के लिये पीवे ॥५॥ जिस खेत की कामना हो उसमें जाकर जल, दही, मधु मिलाकर खावे ॥६॥ एक वर्ष तक स्त्री के पास न जाकर सीप में अपने वीर्य्य को लेकर उसमें चावल मिलाकर खावे तो सात ग्राम का लाभ होगा ॥७॥ द्वादशी से लेकर अमावास्या पूर्व केवल क्षीर खावे, और अमावास्या को दही, मधु, खावे, और इन तीन दिनों में क्षीर खावे, तो उस पुरुष के जल में जल, दही, मधु, पल्पूलन को आसेचन करके खावे ॥ ८॥ “क्रव्यादं नाडी०” इत्यादि मंत्र से स्वाहा करे ॥ रात्रि में अगहनी धान के चावलों में (चावलों को धो करके) मधु मिलाकर आहुति देवे ॥ शरद् ऋतु में जिस किसी रात्रि में व्रीहि तण्डुल और श्यामा मधु मिलाकर जब तक व्रीहि को जव की पंक्तिमें दोनों को न डाले ॥ इस प्रकार दोनों यवों को डाल कर ॥११॥ तीन बार गोबर एकत्र ढेर पर पका कर खावे ॥ १२ ॥