भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६१ न्यपिहितः ॥२४॥ यदग्निरिति परशुं जपंस्तापयति क्वाथयत्यवसिञ्चति ॥२५॥ उप प्रागादित्युद्वीजमानस्य शुक्लप्रसूनस्य वीरणस्य चतसृणामिषीकाणामुभयतः प्रत्युष्टं बध्नाति ॥२६॥ त्रिविदग्धं काण्डमणिम् ॥२७॥ उल्मुके स्वस्त्यायम् ॥२८॥ मातृनाम्नोः सर्वसुरभिचू- र्णान्यन्वक्तानि हुत्वा शेषेण प्रलिम्पति ॥२९॥ चतुष्पथे च शिरसि दर्भेण्डेऽङ्गारकपालेऽन्वक्तानि ॥३०॥ तितउनि प्रतीपं गाहमानो वपतीत्तरोऽवसिञ्चति पश्चात् ॥३१॥ पीस कर कुष्ठ को लेप करे ॥ २२ ॥ पलित को काट २ कर उसे घस कर तब उस पर लेप करे ॥ २३ ॥ और “समुत्पतन्तु प्रनभस्व०” इत्यादि का जप करे ॥ २४ ॥ अब ज्वर के भैषज्य को कहते हैं । नित्य ज्वर, वेला ज्वर, सतत ज्वर, एकांतरित ज्वर, चातुर्थिक ज्वर, और ऋतुज्वर में “यदग्निः” इस तक्मनाशन सूक्त से परशु को गर्म कर क्वाथ बनावे और उस गर्म जल से रोगी को अवसिंचन करे ॥२५॥ जो घबड़ाता हुआ निष्कारण डरता हो, और श्वेत कुष्ठ का रोगी-शरपत के चार इषीकाके अग्र भाग को मणि के आकार बना कर उनको तीन स्थानों में जलाकर उस मणि को रोगी को बान्ध देवे और उस काण्ड मणि को रात्रि में “उप प्रागात्” सूक्तसे दो उल्मुकों को अभिमंत्रण करके घर्षण करे फिर प्रातःकाल “स्वस्तिदा” सूक्त से दक्षिण पग को आगे कर चले । यह स्वस्त्ययन कर्म्म है ॥ बालक, युवा, स्त्री, पुरुषों को अकस्मत् उद्वेग हो जाने पर या प्रलाप करे तो यह कर्म करे ॥२६॥२७॥२८ ॥ गन्धर्व, राक्षस, अप्सरा, भूत और ग्रहादि के उपद्रवों का भैषज्य कहते हैं ॥ “मातृगण” सूक्त से सर्वौषधि के चूर्ण अन्वक्त कर आहुति करके शेष से रोगी को लेप करे ॥ २९ ॥ और चौराहे पर रोगी के शिर पर दर्भ- इन्दुक को धर कर उस पर खप्पर में अग्नि भर कर अग्नि को जला कर तब प्रज्वलित अग्नि में घी चपोड़ी हुई सर्वौषधि की आहुति करे ॥३०॥ रोगी की वल्लणिका को सर्वौषधि सहित हाथ में धर कर नदी सम्मुख हो छलनी में सर्वौषधि चूर्ण को विलोडन करता हुआ वपन करे और उसके पीछे दूसरा कोई रोगी को सूक्त जपता हुआ