कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ३ : अ० ६ ] राजर्षि का व्यवहार १९
(१) अर्थ एव प्रधान इति कौटिल्यः; अर्थमूलौ हि धर्मकामाविति । (२) मर्यादां स्थापयेदाचार्यानमात्यान् वा । य एनमपायस्थानेभ्यो वारयेयुः । छायानालिकाप्रतोदेन वा रहसि प्रमाद्यन्तमभितुदेयुः । (३) सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेकं न वर्तते । कुर्वीत सचिवांस्तस्मात्तेषां च शृणुयान्मतम् ॥
इति कौटीलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे इन्द्रियजये राजर्षिवृत्तं षष्ठोऽध्यायः ।
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( १ ) आचार्य कौटिल्य का अभिमत है कि 'धर्म, अर्थ और काम, इन तीनों में अर्थ प्रधान है, धर्म और काम अर्थ पर निर्भर हैं'।
( २ ) गुरुजन और अमात्यवर्ग राजा की मर्यादा को निर्धारित करें । वे ही राजा को अनर्थकारी कार्यों से रोकते रहें । यदि वह एकान्त में प्रमाद करता हुआ बेसुध हो तो समय-सूचक यन्त्र द्वारा अथवा घंटा आदि बजाकर उसको उद्बुद्ध करें ।
( ३ ) एक पहिये की गाड़ी की भांति राजकाज भी बिना सहायता-सहयोग से नहीं चलाया जा सकता है । इसलिए राजा को चाहिए कि वह सुयोग्य अमात्यों की नियुक्ति कर उनके परामर्शों को हृदयंगम करे ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में छठवां अध्याय समाप्त ।
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