भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

(१) नेति बाहुदन्तीपुत्रः । शास्त्रविददृष्टकर्मा कर्मसु विषादं गच्छेत् । अभिजनप्रज्ञाशौचशौर्यानुरागयुक्तानमात्यान् कुर्वीत, गुणप्राधान्यादिति । (२) सर्वमुपपन्नमिति कौटिल्यः । कार्यसामर्थ्याद्धि पुरुषसामर्थ्यं कल्प्यते सामर्थ्यतश्च । (३) विभज्यामात्यविभवं देशकालौ च कर्म च । अमात्याः सर्व एवैते कार्याः स्युर्न तु मन्त्रिणः ॥

इति विनयाधिकारिके प्रथमाऽधिकरणेऽमात्योत्पत्तिनामकः सप्तमोऽध्यायः ।

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( १ ) आचार्य बाहुदन्तीपुत्र ( इन्द्र ) के मत से यह भी ठीक नहीं है । वे कहते हैं 'नीतिशास्त्रपारंगत, किन्तु क्रियात्मक अनुभव से शून्य व्यक्ति राजकार्यों को नहीं कर सकता है । इसलिए जो लोग कुलीन, बुद्धिमान, विश्वासपात्र, वीर और राज-भक्त हों, उनको अमात्य पद पर नियुक्त करना चाहिए । उनमें गुणों की प्रधानता होती है ।'

( २ ) आचार्य कौटिल्य के मतानुसार, भारद्वाज से लेकर बाहुदन्तीपुत्र तक की विचार-परम्परा, अपने-अपने स्थान पर ठीक है । 'किसी भी पुरुष के सामर्थ्य की स्थिति उसके कार्यों की सफलता पर निर्भर है, और उसकी यह कार्यक्षमता उसकी विद्या-बुद्धि के बल पर ही आँकी जा सकती है ।' इसलिए :

( ३ ) राजा को चाहिए कि वह सहपाठी आदि की भी सर्वथा अवहेलना न करे । उसके लिए वह परमावश्यक है कि वह विद्या, बुद्धि, साहस, गुण, दोष, देश, काल और पात्र का विचार करके ही अमात्यों की नियुक्ति करे; किन्तु उन्हें अपना मन्त्री कदापि न बनाये ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में सातवां अध्याय समाप्त ।

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