भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

तस्मादुञ्छषड्भागमारण्यका अपि निवपन्ति—तस्यैतद् भागधेयं योऽस्मान् गोपायतीति । इन्द्रयमस्थानमेतद् राजानः प्रत्यक्षहेडप्रसादाः । तानवमन्यमानं दैवोऽपि दण्डः स्पृशति । तस्माद् राजानो नावमन्तव्याः इति क्षुद्रकान् प्रतिषेधयेत् । (१) किंवदन्तीं च विद्युः । (२) ये चास्य धान्यपशुहिरण्यान्याजीवन्ति, तैरुपकुर्वन्ति व्यसने अभ्युदये वा, कुपितं बन्धुं राष्ट्रं वा व्यावर्तयन्ति, अमित्रमाटविकं वा प्रतिषेधयन्ति, तेषां मुण्डजटिलव्यञ्जनास्तुष्टात्तुष्टत्वं विद्युः । (३) तुष्टान् भूयः पूजयेत् । अतुष्टांस्तुष्टिहेतोस्त्यागेन साम्ना च प्रसादयेत् । परस्पराद्वा भेदयेदेनान् सामन्ताटविकतत्कुलीनावरुद्धेभ्यश्च । तथाप्यतुष्यतो दण्डकरसाधनाधिकारेण वा जनपदविद्वेषं ग्राहयेत् । विद्विष्टानुपांशुदण्डेन जनपदकोपेन वा साधयेत् । गुप्तपुत्रदारानाकरकर्मान्तेषु वा वासयेत् परेषामस्पदभयात् ।


वाले ऋषि-मुनि भी दाना-दाना करके बीने हुए अन्न का छठा भाग राजा को देते हैं; यह जानकर कि राजा का इस पर सनातन हक है, जिसके बदले में वह हमारी रक्षा करता है। इन्द्र और यम के समान ये राजा लोग भी प्रजाजनों का प्रत्यक्ष निग्रह एवं उनपर अनुग्रह करने वाले होते हैं । इसलिए जो उनका तिरस्कार करता है, निश्चित ही, उस पर दैवी विपत्तियाँ टूटती हैं। यही कारण है, जिनको दृष्टि में रख कर राजा का अपमान नहीं करना चाहिए।' इत्यादि बातों को कह कर राजा की निन्दा करने वालों को रोक दें ।

( १ ) गुप्तचरों के लिए आवश्यक है कि वे अफवाहों पर भी ध्यान दें ।

( २ ) जो लोग धान्य, पशु, हिरण्य आदि से राजा की सेवा करते हैं; विपत्ति और अभ्युन्नति के समय उसकी सहायता करते हैं; राजा के प्रति क्रुद्ध भाई तथा कुपित प्रजा को जो शान्त कर देते हैं; उनकी प्रसन्नता और उनके कोप पर भी मुण्ड एवं जटिल गुप्तचर निगाह रखें ।

( ३ ) जो लोग राजा से सन्तुष्ट हों उन्हें धन और मान द्वारा और भी सन्तुष्ट करना चाहिए । जो किसी कारण अप्रसन्न हैं, उन्हें भी प्रसन्न करने के लिए धन आदि देना चाहिए; सान्त्वना भी देनी चाहिए; न हो तो इन असंतुष्ट व्यक्तियों में आपसी कलह करा दे; सामन्त, आटविक एवं उनके सम्बन्धियों से भी इनकी फूट डाल दे । इन उपायों के बावजूद भी यदि वे असन्तुष्ट ही बने रहें तो राजा को चाहिए कि अपने दण्डसम्बन्धी या करसम्बन्धी अधिकारों द्वारा वह सम्पूर्ण राष्ट्र के साथ उनका द्वेष करा दे । जब सारा जनपद उनका द्वेषी हो जाय तब या तो चुपचाप