भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 131

प्र० १० : अ० १४ ] मंत्राधिकार ४७

(१) मन्त्रिपरिषदं द्वादशामात्यान् कुर्वीतेति मानवाः । (२) षोडशेति बार्हस्पत्याः । (३) विंशतिमित्यौशनसाः । (४) यथासामर्थ्यमिति कौटिल्यः । (५) ते ह्यस्य स्वपक्षं परपक्षं च चिन्तयेयुः । अकृतारम्भमारब्धानुष्ठानमनुष्ठितविशेषं नियोगसम्पदं च कर्मणां कुर्युः । आसन्नैः सह कार्याणि पश्येत् । अनासन्नैः सह पत्रसम्प्रेषणेन मन्त्रयेत । इन्द्रस्य हि मन्त्रिपरिषदृषीणां सहस्रम् । स तच्चक्षुः । तस्मादिमं द्व्यक्षं सहस्राक्षमाहुः । (६) आत्ययिके कार्ये मन्त्रिणो मन्त्रिपरिषदं चाहूय ब्रूयात् । तत्र यद् भूयिष्ठाः कार्यसिद्धिकरं वा ब्रूयुस्तत् कुर्यात् । कुर्वतश्चः—


भाँति समझ-बूझ जाने पर अविलंब ही वह अपने निश्चय को कार्यरूप में परिणत कर दे । किसी कार्य को अधिक समय तक विचारते रहना उचित नहीं है । जिन लोगों का कभी अपकार किया हो, उनके साथ या उनके सहयोगियों के साथ कभी भी मंत्रणा नहीं करनी चाहिए ।

( मन्त्रि-परिषद् का विचार )

( १ ) मनु के अनुयायी अर्थशास्त्रविदों का इस सम्बन्ध में कहना है कि 'मंत्रि-परिषद् में बारह अमात्यों की नियुक्ति की जानी चाहिए ।'

( २ ) वृहस्पति के अनुयायी विद्वान् 'सोलह मन्त्रियों' के पक्ष में हैं ।

( ३ ) शुक्राचार्य-पक्ष के आचार्य मन्त्रियों की संख्या 'बीस' रखना अधिक उपयुक्त समझते हैं ।

( ४ ) आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'कार्य करने वाले पुरुषों के सामर्थ्य के अनुसार ही उनकी संख्या नियत होनी चाहिए ।'

( ५ ) वे निर्धारित मन्त्री विजिगीषु राजा के और उसके शत्रु राजा के सम्बन्ध में विचार करें । जो कार्य प्रारम्भ न किये गए हों उन्हें प्रारम्भ करायें; प्रारम्भ किये कार्यों को पूरा करावें और जो कार्य पूरे हो चुके हों उनमें आवश्यकतानुसार संशोधन-संमार्जन करें । निष्कर्ष यह कि विभागीय अध्यक्ष अपने-अपने कार्यों को अंत तक अधिकाधिक निपुणता से सम्पन्न करें । जो मन्त्री राजा के सन्निकट हों, उनको साथ लेकर राजा उनके कार्यों का स्वयं ही निरीक्षण करे । किन्तु जो दूर हों, उनसे पत्र द्वारा परामर्श करता रहे । इन्द्र की मन्त्रि-परिषद् में एक हजार ऋषि थे, जो कि उसके कार्यों के निर्देशक थे । इसीलिए तो दो नेत्रों वाले इन्द्र को हजार आँखों वाला ( सहस्राक्ष ) कहा गया है ।

( ६ ) अत्यावश्यक कार्य के आ जाने पर राजा, मन्त्रि-परिषद् का आयोजन कर