भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135

प्र० ११ : अ० १५ ] राजदूतों को शत्रु-देश में भेजना ५१

मत्तोन्मत्तसुप्तप्रलापैः पुण्यस्थानदेवगृहचित्रलेख्यसंज्ञाभिर्वा चारमुपलभेत । उपलब्धस्योपजापमुपेयात् । परेण चोक्तः स्वासां प्रकृतीनां परिमाणं नाच-क्षीत । सर्वं वेद भवानिति ब्रूयात्, कार्यसिद्धिकरं वा । (१) कार्यस्य सिद्धावुपरुध्यमानस्तर्कयेत् । किं भर्तुर्मे व्यसनमासन्नं पश्यन्, स्वं वा व्यसनं प्रतिकर्तुकामः, पार्ष्णिग्राहासारवन्तः—कोपमाट-विकं वा समुत्थापयितुकामः, मित्रमाक्रन्दं वा व्यापादयितुकामः, स्वं वा परतो विग्रहमन्तःकोपमाटविकं वा प्रतिकर्तुकामः, संसिद्धं मे भर्तुर्यात्रा-कालमभिहन्तुकामः, सस्यकुप्यपण्यसङ्ग्रहं दुर्गकर्म बलसमुत्थानं वा कर्तु-कामः, स्वसैन्यानां वा व्यायामदेशकालावाकाङ्क्षमाणः, परिभवप्रमदाभ्यां वा, संसर्गानुबन्धार्थी वा मामुपरुणद्धीति ज्ञात्वा वसेदपसरेद्वा । प्रयोजन-


कार्यों का पता लगाता रहे । तीर्थस्थानों, देवालयों, गृहचित्रों तथा लिपिसंकेतों द्वारा भी वह वहाँ के वृत्तान्त जाने । ठीक-ठीक समाचार अवगत हो जाने पर वह तदनुसार भेदरूप उपायों का प्रयोग करे । दूत को चाहिए कि शत्रु के पूछे जाने पर भी वह अपने मन्त्रिपरिषद् का ठीक-ठीक परिचय न दे । 'आप तो सर्वज्ञ हैं' इतना कहकर बात को टाल दे । यदि इतना बताने पर भी शत्रुराजा को सन्तोष न हो तो उतना मात्र परिचय देना चाहिये, जितने से अपने कार्य की सिद्धि हो जाय ।

( १ ) कार्य सिद्ध हो जाने पर भी यदि शत्रुराजा दूत को अपने ही यहाँ रोके रखना चाहता है, तो दूत को, राजा की इस अप्रत्याशित नीति के सम्बन्ध में गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए । उसको विचार करना चाहिए कि 'क्या शत्रु-राजा को मेरे स्वामी पर आनेवाली किसी सन्निकट विपत्ति का पता लग गया है । या कि वह मेरे जाने से पूर्व ही अपने किसी व्यसन का प्रतीकार करना चाहता है । अथवा वह पार्ष्णिग्राह (स्वामिराजा का शत्रु एवं शत्रुराजा का मित्र ) तथा आसार ( शत्रुराजा के मित्र का मित्र ) को मेरे स्वामी के विरोध में युद्ध करने के लिए तो नहीं उकसाना चाहता । या उसका इरादा मेरे स्वामी के अमात्य आदि को उससे कुपित करने का तो नहीं है । या कि वह किसी आटविक को भिड़ाने की साजिश तो नहीं रच रहा है । उसकी योजना ऐसी तो नहीं है कि वह मित्र ( स्वामिराजा के सम्मुख प्रदेश का मित्रराजा ) तथा आक्रंद ( स्वामिराजा के पृष्ठप्रदेश का मित्र राजा ) आदि मित्रराष्ट्रों के राजाओं को मरवाना चाहता हो । या अपने ऊपर किये गये आक्रमण का, अपने अमात्य आदि के कोप का तथा अपने आटविक का प्रतीकार तो नहीं करना चाहता है । या कि वह मेरे स्वामी के इस प्रस्तुत आक्रमण को टालने तथा रोकने का यत्न तो नहीं कर रहा है । अथवा वह युद्ध की तैयारी के लिए धातुसंग्रह, किलाबन्दी तथा सैन्य-संग्रह तो नहीं कर रहा है । या वह सैन्य-शिक्षण तथा उचित देश-काल की आकांक्षा में तो नहीं है । अथवा किसी प्रकार के तिरस्कार, प्रीति, विवाह-सम्बन्ध, दोष-वैमनस्य आदि के लिए तो वह मुझे नहीं रोक रहा है ।'