कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १६ : अ० २० ] आत्मरक्षा का प्रबन्ध ७३
(१) निर्याणेऽभियाने च राजमार्गमुभयतः कृतारक्षं दण्डिभिरपास्त- शस्त्रहस्तप्रव्रजितव्यङ्गं गच्छेत् । न पुरुषसम्बाधमवगाहेत । यात्रासमाजो- त्सवप्रवहणानि च दशवर्गिकाधिष्ठितानि गच्छेत् । (२) यथा च योगपुरुषैरन्यान् राजाऽधितिष्ठति । तथाऽयमन्यबाधेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥
इति विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे आत्मरक्षितकं विंशोऽध्यायः ।
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राजा के दूत से मिले । घोड़े, हाथी या रथ पर सवार युद्ध के लिए प्रस्थान करने वाली सेना का वह युद्धोचित कवच आदि पहिन कर सैनिक वेश में निरीक्षण करे ।
( १ ) बाहर जाते या बाहर से आते समय राजा, हाथ में दण्ड लिये रक्षकों द्वारा दोनों ओर से सुरक्षित मार्ग पर चले । ऐसा प्रबंध हो कि रास्ते भर में कहीं भी राजा को शस्त्ररहित पुरुष, संन्यासी या लूला-लंगड़ा, अपंग व्यक्ति न दिखाई दे । पुरुषों की भीड़ में भी वह कदापि न घुसे । किसी देवालय, सभा, उत्सव तथा पार्टी आदि में वह शामिल होने जाय तो कम से कम दस सिपाही तथा सेनानायक उसके साथ उपस्थित रहें ।
( २ ) विजय की इच्छा रखने वाला राजा जैसे अपने गुप्तचरों द्वारा दूसरों को कष्ट पहुँचाता है, उसी प्रकार दूसरों के द्वारा दिये गए कष्टों से भी वह अपनी रक्षा करे ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में बीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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