कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १७ |
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| अध्याय १ |
जनपदनिवेशः
(१) भूतपूर्वमभूतपूर्वं वा जनपदं परदेशापवाहनेन स्वदेशाभिष्यन्द-वमनेन वा निवेशयेत् । (२) शूद्रकर्षकप्रायं कुलशतावरं पञ्चशतकुलपरं ग्रामं क्रोशद्विक्रोश-सीमानमन्योन्यारक्षं निवेशयेत् । नदीशैलवनगृष्टिदरीसेतुबन्धशाल्मली-शमीक्षीरवृक्षानन्तेषु सीम्नां स्थापयेत् । (३) अष्टशतग्राम्या मध्ये स्थानीयं, चतुश्शतग्राम्या द्रोणमुखं, द्विशतग्राम्याः खार्वटिकं, दशग्रामीसङ्ग्रहेण सङ्ग्रहणं स्थापयेत् । (४) अन्तेष्वन्तपालदुर्गाणि, जनपदद्वाराण्यन्तपालाधिष्ठितानि स्थापयेत् । तेषामन्तराणि वागुरिकशबरपुलिन्दचण्डालारण्यचरा रक्षेयुः । (५) ऋत्विगाचार्यपुरोहितश्रोत्रियेभ्यो ब्रह्मदेयान्यदण्डकराण्यभि-
जनपदों की स्थापना
( १ ) राजा को चाहिए कि दूसरे देश के मनुष्य को बुलाकर अथवा अपनी देश की आबादी को बढ़ाकर वह पुराने या नये जनपद को बसाये ।
( २ ) प्रत्येक जनपद में कम से कम सौ घर और अधिक से अधिक पांच सौ घर वाले, ऐसे गाँव बसायें जायें जिसमें प्रायः शूद्र तथा किसान अधिक हों । एक गाँव दूसरे गाँव से कोस भर या दो कोस की दूरी से अधिक नहीं होना चाहिए, जिससे अवसर आने पर वे एक दूसरे की मदद कर सकें । नदी, पहाड़, जंगल, बेर के वृक्ष, खाई, तालाब, सेंमल के वृक्ष, शमी के वृक्ष और बरगद आदि के वृक्ष लगाकर उन बसाये हुए गाँवों की सीमा निर्धारित करे ।
( ३ ) आठ सौ गाँवों के बीच में एक स्थानीय; चार सौ गाँवों के समूह में एक द्रोणमुख; दो सौ गाँवों के बीच में एक कार्वटिक और दस गाँवों के समूह में संग्रहण नामक स्थानों की विशेष रूप से स्थापना करे ।
( ४ ) राज्य की सीमा पर अंतपाल नामक दुर्गरक्षक के संरक्षण में एक दुर्ग की भी स्थापना करे । जनपद की सीमा पर अंतपाल की अध्यक्षता में ही द्वारभूत स्थानों का भी निर्माण करे । उनके भीतरी भागों की रक्षा व्याध, शबर, पुलिन्द, चाण्डाल आदि वनचर जातियों के लोग करें ।
( ५ ) राजा को चाहिए कि वह ऋत्विक्, आचार्य, पुरोहित तथा श्रोत्रिय आदि ब्राह्मणों के लिए भूमिदान करे, किन्तु उनसे कर आदि न ले और उस भूमि को