भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० २३ : अ० ७ ] गाणनिक के कार्य १०७

(१) कोशपूर्वमहोरूपहरं धर्मव्यवहारचरित्रसंस्थानसङ्कलननिर्वर्तना-नुमानचारप्रयोगैरवेक्षेत । (२) दिवसपञ्चरात्रपक्षमासचातुर्मास्यसंवत्सरैश्च प्रतिसमानयेत् । व्युष्टदेशकालमुखोत्पत्त्यनुवृत्तिप्रमाणदायकदापकनिबन्धकप्रतिग्राहकैश्चायं समानयेत् । व्युष्टदेशकालमुखलाभकारणदेययोगपरिमाणाज्ञापकोद्धारक-निधातृकप्रतिग्राहकैश्च व्ययं समानयेत् । व्युष्टदेशकालमुखानुवर्तनरूप-लक्षणपरिमाणनिक्षेपभाजनगोपायकैश्च नीवीं समानयेत् । (३) राजार्थे कारणिकस्याप्रतिबध्नतः प्रतिषेधयतो वाऽज्ञां निबन्धा-दायव्ययमन्यथा वापि कल्पयतः पूर्वः साहसदण्डः ।


( १ ) कोषधन और कोषरजिस्टर लानेवाले अध्यक्ष की परीक्षा पहिले धर्म के द्वारा ली जाय, अर्थात् उसे देखा जाय कि वह धर्मात्मा है या दम्भी, फिर उसके व्यवहार को देखा जाय, तदनन्तर उसके आचार-विचार, उसकी पूर्वस्थिति, उसके कार्य एवं हिसाब-किताब, और अन्त में उसके कार्यों का पारस्परिक मिलान करके उसकी परीक्षा ली जाय, गुप्तचरों द्वारा भी उसके भेद जाने जाँय ।

( २ ) अध्यक्ष को चाहिये कि वह प्रतिदिन, प्रति पाँच दिन, प्रतिपक्ष, प्रतिमास, प्रति चार मास और प्रतिवर्ष के क्रम से राजकीय आय-व्यय एवं नीवी का लेखा-जोखा साफ-सुथरे ढंग में रखे । अर्थात् वर्षारंभ से, पहिले एक दिन का हिसाब, फिर एक साथ पाँच दिन का हिसाब, फिर एक साथ पन्द्रह दिन का हिसाब, फिर एक साथ एक मास का हिसाब, और अन्त में एक साथ पूरे एक वर्ष का हिसाब करके रखे । आय का लेखा निर्दोष और साफ रहे, एदतर्थ रजिस्टर में राजवर्ष ( मास, पक्ष, दिन ), देश, काल, मुख ( आयमुख, आयशरीर ), उत्पत्ति ( आयवृद्धि ), अनुवृत्ति ( स्थानान्तर ) प्रमाण, कर देनेवाले का नाम, दिलानेवाले अधिकारी का नाम, लेखक का नाम और लेनेवाले का नाम, इस प्रकार के स्तंभ ( खाने ) बने होने चाहिए । व्यय का लेखा तैयार करने के लिए रजिस्टर में इस प्रकार के खाने होने चाहिए : व्युष्ट, देश, काल, मुख, लाभ ( पक्ष, मास, वर्ष के क्रम से ) व्यय का कारण, देय वस्तु का नाम, मिलावटी द्रव्य में अच्छाई-बुराई का उल्लेख, तौल, किसकी आज्ञा से व्यय किया गया, किसको दिया गया, भाण्डागारिक और लेनेवाले का पूरा विवरण । इसी प्रकार नीवी ( शेष धन ) का लेखा ; व्युष्ट, देश, काल, मुख, द्रव्य का स्वरूप, द्रव्य की विशेषता, तौल, जिस पात्र में द्रव्य रखा जाय और द्रव्य का संरक्षक, आदि विवरणों के आधार पर तैयार करना चाहिए ।

( ३ ) यदि कारणिक ( क्लर्क ) अर्थलाभ को रजिस्टर में दर्ज नहीं करता है, राजकीय आज्ञा का उल्लंघन करता है, अथवा आय-व्यय के संबंध में विपरीत कल्प-नाऐं भी करता है तो उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।