कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) पण्यव्यवहारो व्यवहारः । तत्र फलद्विगुणो दण्डः । (२) सिद्धं कालमप्राप्तं करोत्यप्राप्तं प्राप्तं वेत्यवस्तारः । तत्र पञ्चबन्धो दण्डः । (३) क्लृप्तमायं परिहापयति व्ययं वा विवर्धयतीति परिहापणम् । तत्र हीनचतुर्गुणो दण्डः । (४) स्वयमन्यैर्वा राजद्रव्याणामुपभोजनमुपभोगः । तत्र रत्नोपभोगे घातः, सारोपभोगे मध्यमः साहसदण्डः, फल्गुकुप्योपभोगे तच्च तावच्च दण्डः । (५) राजद्रव्याणामन्यद्रव्येणादानं परिवर्तनं, तद् उपभोगेन व्याख्यातम् । (६) सिद्धमायं न प्रवेशयति निबद्धं व्ययं न प्रयच्छति, प्राप्तां नीवीं विप्रतिजानीत इत्यपहारः । तत्र द्वादशगुणो दण्डः ।
( १ ) कोष के द्रव्य से स्वयं ही व्यापार करना व्यवहार कहलाता है । ऐसा करने पर भी दुगुना दण्ड देना चाहिए ।
( २ ) राजकर वसूल करनेवाला अधिकारी, नियत समय से कर-वसूली न करके रिश्वत लेने की इच्छा से, मियाद बीत जाने का भय देकर प्रजा को तंग करके जो धन एकत्र करता है उसे अवस्तार कहते हैं । ऐसा करने पर उसे नुकसान की राशि से पाँचगुना दण्ड देना चाहिए ।
( ३ ) जो अध्यक्ष अपने कुप्रबंध के कारण कर की आय को कम कर देता और व्यय की राशि को बढ़ा देता है, उस क्षय को परिहापण कहते हैं । ऐसा करने पर अध्यक्ष को क्षय से चौगुना दण्ड दिया जाय ।
( ४ ) राजकोष के द्रव्य को स्वयं भोग करना तथा दूसरों को भोग कराना 'उपभोग' क्षय है । इसके अपराध में अध्यक्ष को, यदि वह रत्नों का उपभोग करता है तो प्राणदण्ड, सारद्रव्यों का उपभोग करता है तो मध्यम साहस दण्ड, और फल्गु एवं कुप्य आदि पदार्थों का उपभोग करता है तो, उससे द्रव्य वापिस लेकर उसकी लागत का दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ५ ) राजकोष के द्रव्यों को दूसरे द्रव्यों से बदल लेना परिवर्तन कहलाता है । इस कार्य को करने वाले अध्यक्ष के लिए भी उपभोग-क्षय के समान ही दण्ड दिया जाय ।
( ६ ) प्राप्त आय को रजिस्टर में न चढ़ाना, नियमित व्यय को रजिस्टर में चढ़ाकर भी खर्च न करना और प्राप्त नीवी के सम्बन्ध में मुकर जाना, यह तीन