कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 203, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण २६ | # शासनाधिकारः |
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| अध्याय १० |
(१) शासने शासनमित्याचक्षते । शासनप्रधाना हि राजानः, तन्मूलत्वात् । सन्धिविग्रहयोः ।
(२) तस्मादमात्यसम्पदोपेतः सर्वसमयविदाशुग्रन्थश्चार्वक्षरो लेखवाचनसमर्थो लेखकः स्यात् । सोऽव्यग्रमना राज्ञः सन्देशं श्रुत्वा निश्चितार्थं लेखं विदध्याद्, देशैश्वर्यवंशनामधेयोपचारमीश्वरस्य, देशनामधेयोपचारमनीश्वरस्य ।
(३) जातिं कुलं स्थानवयःश्रुतानि कर्माद्धिशीलान्यथ देशकालौ ।
यौनानुबन्धं च समीक्ष्य कार्ये लेखं विदध्यात् पुरुषानुरूपम् ॥(४) अर्थक्रमः, सम्बन्धः, परिपूर्णता, माधुर्यमौदार्यं, स्पष्टत्वम्, इति लेखसम्पत् ।
शासनाधिकार
( १ ) राजा की ओर से पत्र आदि पर लिखित आज्ञा या प्रतिज्ञा का नाम 'शासन' है । राजा लोग शासन ( लिखित बात ) पर ही विश्वास करते हैं, मौखिक बात पर नहीं । संधि, विग्रह आदि षाड्गुण्य संबंधी राजकीय कार्य शासनमूलक ( लिखित ) होने पर ही ठीक समझे जाते हैं ।
( २ ) इसलिए राजकीय शासन को लिखनेवाले लेखक को अमात्य की योग्यताओं वाला, आचार-विचार का ज्ञाता, शीघ्र ही सुंदर वाक्य-योजना में निपुण, सुलेखक और विभिन्न लिपियों को पढ़ने-लिखने वाला होना चाहिए । वह लेखक प्रकृतिस्थ होकर राजा के संदेश को सुने और पूर्वापर प्रसंगों को दृष्टि में रखकर स्पष्ट अभिप्राय प्रकट करनेवाले लेख को लिखे । लेख यदि किसी राजा से संबद्ध हो तो, उसमें देश, ऐश्वर्य, वंश और नाम का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए । यदि उसका संबंध किसी अमात्य से हो तो उसमें केवल उसके देश और नाम का ही उल्लेख किया जाय ।
( ३ ) लेख यदि राजकार्य-संबंधी हो तो उसमें जाति, कुल, स्थान, आयु, योग्यता, कार्य, धन-संपत्ति, सदाचार, देश, काल, वैवाहिक संबंध आदि बातों का भली-भांति विचार करके, प्राप्तकर्ता पुरुषों की श्रेष्ठता, निकृष्टता आदि का भी अवश्य उल्लेख करे ।
( ४ ) उस लेखक में १. अर्थक्रम, २. संबंध, ३. परिपूर्णता, ४. माधुर्य, ५. औदार्य और ६. स्पष्टता आदि छह प्रकार की योग्यताएँ होनी चाहिए ।