भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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१३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

तीक्ष्णमूत्रक्षारभाविता राजवृक्षवटपीलुगोपित्तरोचनामहिषखरकरभमूत्र- लण्डपिण्डबद्धास्तत्प्रतीवापास्तदवलेपा वा विशुद्धाः स्रवन्ति । (१) यवमाषतिलपलाशपीलुक्षारैर्गोक्षीराजक्षीर्वा कदलीवज्रकन्दप्रती- वापो मार्दवकरः । (२) मधुमधुकमजापयः सतैलं घृतगुडकिण्वयुतं सकन्दलीकम् । यदपि शतसहस्रधा विभिन्नं भवति मृदु त्रिभिरेव तन्निषेकैः ॥ (३) गोदन्तशृङ्गप्रतीवापो मृदुस्तम्भनः । (४) भारिकः स्निग्धो मृदुश्च प्रस्तरधातुर्भूमिभागो वा पिङ्गलो हरितः पाटलो लोहितो वा ताम्रधातुः । (५) काकमेचकः कपोतारोचनावर्णः श्वेतराजिनद्धो वा विस्रः सीसधातुः ।


ही भारीपन होगा वे उतनी ही उत्तम कोटि के सिद्ध होंगी। इनमें जो धातु अशुद्ध हो अथवा मैल जम जाने के कारण जिसके गुण-दोषों का यथार्थ ज्ञान नहीं हो पा रहा हो उसका शोधन कर लिया जाय। शोधन के प्रकार ये हैं : तीक्ष्णमूत्र (मनुष्य हाथी-घोड़ा, गाय, गधा, बकरा आदि में से किसी का मूत्र), तीक्ष्णक्षार, अमलतास, बरगद, पीलु, गोरोचन, भैंसे का मूत्र, बालक का मूत्र तथा उनके पुरीष, (मल) आदि वस्तुओं में कई बार धातुओं की भावनाएं देने से वे विशुद्ध हो जाती हैं, अमल-तास आदि के चूर्ण से अथवा उनके लेप से भी धातु का मल नष्ट होकर वे अपने असली रूप में आ जाती हैं।

(१) जो उड़द, तिल, ढाक, पीलु, वृक्ष का क्षार और गाय तथा बकरी के दूध में केला एवं सूरण को एक साथ मिलाकर यदि उनमें सोने-चांदी की भावना दी जाय तो वे नर्म हो जाते हैं।

(२) शहद, मुलहटी, बकरी का दूध, तेल, घी, गुड़ की शराब और खादर में पैदा होने वाले झाड़ आदि सब को मिलाकर, उनमें तीन बार सोने-चांदी की भावना दी जाय तो वे चाहे जितने भी कटे-फटे खुरदरे क्यों न हों, मुलायम हो जाते हैं।

(३) यदि पिघले हुए सोने-चांदी के ऊपर गाय के दाँत तथा सींग का चूर्ण बुरक दिया जाय तो सोना-चांदी ठोस हो जाते हैं।

(४) जहाँ पाषाणधातु, भूमिधातु, और ताम्रधातु, इन तीन प्रकार के पत्थर तथा मिट्टी के चिकने एवं मृदु भू-भाग हों, वहाँ ताँबे की खान होती है। ताँबा चार प्रकार का होता है : १. पिङ्गल २. हरित ३. पाटल और ४. लोहित।

(५) जो भूमि-भाग कौए के समान काला, कबूतर तथा गोरोचन की आकृति वाला, सफेद रेखाओं से युक्त और दुर्गन्धपूर्ण हो, वहाँ सीसा की खान समझनी चाहिए।