कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० २६ : अ० १३ ] सुवर्णाध्यक्ष के कार्य १४७
(१) अर्पयेत् काचकर्मणः पञ्चभागं काञ्चनं दशभागं कटुमानम् । ताम्रपादयुक्तं रूप्यं रूप्यपाद्युक्तं वा सुवर्णं संस्कृतकं तस्माद्रक्षेत् । (२) पृषतकाचकर्मणस्त्रयो हि भागाः परिभाण्डं द्वौ वास्तुकम् । चत्वारो वा वास्तुकं त्रयः परिभाण्डम् । (३) त्वष्टृकर्मणः । शुल्बभाण्डं समसुवर्णेन संयूहयेत् । रूप्यभाण्डं घनं घनसुषिरं वा सुवर्णार्धेन अवलेपयेत् । चतुर्थभागसुवर्णं वा बालुकाहिङ्गुल-कस्य रसेन चूर्णेन वा वासयेत् । (४) तपनीयं ज्येष्ठं सुवर्णं सुरागं, समसीसातिक्रान्तं पाकपत्रपक्वं सैन्धविकयोज्ज्वलितं नीलपीतश्वेतहरितशुकपोतवर्णानां प्रकृतिर्भवति ।
( १ ) मणियों की जुड़ाई सम्बन्धी कार्य को काचकर्म कहते हैं । मणि के पाँचवें हिस्से को सोने से पिरो दे; मणि इधर-उधर न होने पावे, उसके लिए चारों ओर से सोने की पट्टी लगी रहती है उसको कटुमान कहा जाता है। मणि का जितना हिस्सा सोने में पिरो दिया जाय उसका आधा हिस्सा ( दसवाँ भाग ) कटुवान का होना चाहिए; स्वर्णकार शुद्ध किए हुए सोने में मिलावट कर सकते हैं; चाँदी की जगह ताँबा और सोने की जगह चाँदी भर कर वे उतने अंश को हड़प कर सकते हैं; यह मिलावटी सोना-चाँदी शुद्ध ही जैसा प्रतीत होता है; इसलिए इस सम्बन्ध में अध्यक्ष को पूरी निगरानी रखनी चाहिए ।
( २ ) मिश्रित काचकर्म के सम्बन्ध में ध्यान रखना चाहिए कि पहिले गुटिका आदि से मिश्रित काचकर्म के लिए जितना सुवर्ण निर्धारित हो उसके पाँच भाग किए जाँय; उनमें तीन भाग पद्म, स्वस्तिक आदि बनाने के लिए और दो भाग उसका आधारपीठ बनाने के लिए होता है; यदि मणि बड़ी हो तो सुवर्ण के सात हिस्से करने चाहिए । जिनमें चार हिस्से आधार के लिए और शेष तीन हिस्से स्वस्तिक आदि के लिए काम में लाये जाँय ।
( ३ ) ताँबे तथा चाँदी के घनपात्र की विधि इस प्रकार है : जितना ताँबे का पात्र हो उतना ही सोने का पत्र उसके ऊपर चढ़वा देना चाहिए; चाँदी का पात्र चाहे ठोस हो या पोला हो, उस पर उसके भार से आधे, सोने का पानी चढ़वा दे; अथवा चौथा हिस्सा सोना लेकर उसे बालू और शिंगरफ के चूर्ण एवं रस के साथ मिलाकर भूसी अग्नि में पिघलाकर पानी की तरह चढ़वा दे ।
( ४ ) आभूषण आदि के लिए प्रस्तुत, कमलरज के समान स्वच्छ, स्निग्ध और चमकदार सोना उत्तम किस्म का है । वह शुद्ध सोना नील, पीत, श्वेत, हरित और शुकपोत ( तोते का बच्चा ) आदि रङ्ग के आभूषणों के योग्य होता है । अशुद्ध सुवर्ण में उसके परिमाण का सीसा डालकर उसे शुद्ध किया जाय; अथवा उसके पतले-पतले पत्र बनाकर फिर अरणे के कण्डों की तपन से उसको शुद्ध किया जाय;