कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 237, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्र० ३० : अ० १४ ] राजकीय स्वर्णकारों के कर्तव्य १५३
कालवणम्। तदेव सुवर्णमित्यपसारणमार्गाः। पूर्वप्रणिहिता वा पिण्ड-वालुका मूषाभेदादग्निष्ठा उद्ध्रियन्ते। (१) पश्चाद्बन्धने आचितकपत्रपरीक्षायां वा रूप्यरूपेण परिवर्तनं विस्रावणम्, पिण्डबालुकानां लोहपिण्डबालुकाभिर्वा। (२) गाढश्चाभ्युद्धार्यश्च पेटकः संयूह्यावलेप्यसङ्घात्येषु क्रियते। सीसरूपं सुवर्णपत्रेणावलिप्तमभ्यन्तरमष्टकेन बद्धं गाढपेटकः। स एव पटलसम्पुटेष्वभ्युद्धार्यः। पत्रमाश्लिष्टं यमकपत्रं वावलेप्येषु क्रियते। शुल्बं तारं वा गर्भः पत्राणाम्। संधात्येषु क्रियते शुल्बरूपं सुवर्णपत्रसंहतं प्रमृष्टं सुपार्श्वम्। तदेव यमकपत्रसंहतं प्रमृष्टम्। ताम्रताररूपं चोत्तर-वर्णकः।
( सन्सी ), जोंगनी ( लोहे की छड़ ) सुर्वचिका ( शोरा ) और नमक । उनसे जब कहा जाय कि उन्होंने सोना खोटा कर दिया है, तो झट ये कह देते हैं कि यह आप का दिया हुआ सोना है, यह खान से ही ऐसा निकला है । ये अपसारण के तरीके हैं । या पहिले ही से आग में बारीक बालुका-सी डाल दी जाती है और फिर मूषा को अग्नि में रख कर मूषा को टूट जाने का बहाना करता है और तब मालिक के सामने उस बालुका को सोने में मिला दिया जाता है और उतना ही सोना वह होशियारी से मार लेता है ।
( १ ) किसी बनी हुई वस्तु को पीछे से जोड़ते समय या पात्रों की परीक्षा करते समय खरे सोने की जगह खोटा सोना जोड़ देना विस्रावण कहलाता है । सोने की खान में उत्पन्न बालुका को लोहे की खान में उत्पन्न बालुका से बदल देना भी विस्रावण कहलाता है ।
( २ ) पेटक दो प्रकार का होता है : १. गाठ और १. अभ्युद्धार्य; इसका प्रयोग संयूह्य, अवलेप्य तथा संघात्य कर्मों में किया जाता है । सीसे के पत्ते को सोने के पत्ते से मढ़ कर वीच में लाख से जोड़ देना ही गाठपेटक कहलाता है । वही बन्धन यदि सरलता से खुलने योग्य हो तो उसे अभ्युद्धार्यपेटक कहते हैं । अवलेप्य क्रियाओं में एक ओर या दोनों ओर सोने का पतला सा पत्रा जोड़ कर सोने को चुराया जा सकता है । अथवा बाहर पत्ता लगाने की बजाय सुवर्ण पत्रों के बीच में तांबे या चांदी का पत्ता लगा कर भी सोना चुराया जाता है । संघात्य क्रियाओं में तांबे की वस्तु को एक ओर से सोने के पत्ते से मढ़कर उस हिस्से को खूब चमकदार एवं सुन्दर बना दिया जाता है । उसी तांबे की वस्तु को दोनों ओर से इसी प्रकार चमकदार एवं सुन्दर सोने के पत्तों से मढ़कर उतना ही असली सोना हड़प लिया जाता है ।